राजाजी श्री बृजलाल सिंह जी

काछ दृढ़ा कर बरसणा, मन चंगा मुख मिट्ठ।
रण सूरा जग वल्लभा, सो रजपूतां दिट्ठ ।।

चंगोई गढ़