राठौड़ वंश :उत्पत्ति
राठौड़ वंश : उत्पत्ति
(By- घनश्यामसिंह चंगोई)
ब्रज देशां , चंदन वनां , मेरु पहाड़ां मोड़ !
गरुड़ खगां, लंका गढां, राजकुलां राठौड़ !
(जिस तरह सभी प्रदेशों में ब्रज प्रदेश, वनों में चंदन वन, पहाड़ों में सुमेरु पर्वत, पक्षियों मे गरुड़ व गढ़ों में लंका गढ़, मोड़ (मुकुट) की तरह है, या सर्वोच्च है ! उसी प्रकार राठौड़ कुल सभी राजकुलों का मुकुट है)
भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज अयोध्या के अंतिम सूर्यवंशी राजा सुमित्र के एक पुत्र विश्वराज के वंशज *राठौड़* हुए। सुमित्र के दूसरे पुत्र कूर्म के वंशज *कछवाह* कहलाये। सुमित्र के तीसरे पुत्र वज्रनाभ के वंशज आगे चलकर *गुहिलोत* कहलाये। (कुछ इतिहासकार कच्छवाहों की उत्पत्ती कुश के नाम से भी मानते हैं) !
राठौड़ नाम की उत्पत्ति
क्षत्रियों के 36 कुलों में राठौड़ की गणना की जाती है। सबसे पहले विक्रम संवत 1205 की कल्हण की ”राजतरंगिणी” में क्षत्रियों के 36 कुलों का उल्लेख मिलता है| यहाँ ”पृथ्वीराज रासो” की उन पंक्तियों का उल्लेख किया जा रहा है जिनमें उन 36 कुलों के नाम गिनाये गए हैं –
"रवि ससि जादव वंस ककटस्थ परमार सदावर!
चाहुवान चालुक्य छन्द सिलार अभीयर !!
दोयमत मकवान गुरुअ गोहिल गोहिलपुत !
चापोत्कट परिहार राव राठौर रोसजुत !!
देवरा टांक सैंधव अणिग योतिक प्रतिहार दघिषत !
कारटपाल कोटपाल हूल हरित गोरकला[मा] षमट!!
धन [धान्य] पालक निकुंभवार, राजपाल कविनीस!
कालच्छुरकै आदि दे बरने बंस छतीस !!”
ये 36 कुल सूर्यवंश, चन्द्रवंश एवं अन्य वंशों में विभक्त हैं।
क्षत्रिय वर्ण के अन्तर्गत अनेक जातियों का जन्म हुआ। इन जातियों में ”राठौर” जाति प्रमुख है क्योकि इसका बहुत प्राचीन एवं विशाल इतिहास है। इस जाति में अनेक राजा और महाराजा हुए जो बडे शक्तिशाली एवं प्रतापी थे। ये गहरवार, राष्ट्रवर, राष्ट्रकूट एवं राष्ट्रिक नामों से भी जाने गये।
बलहट बंका देवड़ा, करतब बंका गौड़ !
हाड़ा बंका गाढ मं, रण बंका राठौड़ !!
ऐतिहासिक तथ्य
ऐतिहासिक तथ्य
(संकलन - घनश्यामसिंह चंगोई)
दक्षिण भारत के राठौड़
‘‘राठौर या राठौड़,” के इतिहास के शोध से स्पष्ट हुआ है कि बौद्ध काल के पूर्व राष्ट्रकूट का दक्षिण भारत में राज था।महाराष्ट्र के कालाडिगी जिले में येवूर गांव के प्राचीन सोमेश्वर महादेव मंदिर में मिले एक शिलालेख के अनुसार विक्रम संवत 550 में दक्षिण में राष्ट्रकूट राजा कृष्ण के पुत्र का प्रबल राज्य था, जिसकी सेना में 800 हाथी थे। चालुक्य राजा जयसिंह प्रथम ने उसे हराया था।
एलोरा के दशावतार शिलालेख के अनुसार मयूरखंडी (वर्तमान में कर्नाटक के बीदर जिले में) के राठौड़ राजा दंतिवर्मा के वंशज गोविन्दराज तृतीय ने पुलकेशी (द्बितीय) पर चढ़ाई की। उसके पोत्र दंतिदुर्ग ने सम्वत 810 में चालुक्य राजा वल्लभ को हराया व कांची, लाट, कलिंग, कौशल, श्रीशैल, मालव, टंक आदि देशों के राजाओं को हराकर 'श्रीबल्लभ' नाम धारण किया। तथा उज्जैन में स्वर्ण व रत्न का दान किया। इसके उत्तराधिकारी कृष्णराज ने एलोरा का केलाशमन्दिर बनवाया। कृष्णराज के 11 वे वंशज अमोघवर्ष (सम्वत 874 से 934) ने राजधानी मान्यखेट (वर्तमान में कर्नाटक के गुलबर्गा जिले में) को बसाया। इसीके पुत्र कृष्णराज (द्वितीय) ने भोज प्रतिहार (प्रथम) को हराया (बेगुमरा का ताम्रपत्र सम्वत 945) ! हिजरी सन 332 (वि सं 1001) में आये अरब यात्री 'अलमसुदी' द्वारा लिखित पुस्तक 'मुरुजुल जहब' में लिखा है, 'इस समय मान्यखेट का राजा बलहारा (राठोड़) कृष्णराज (तृतीय) सर्वाधिक शक्तिशाली है।' सम्वत 1038 में कृष्णराज के पौत्र कर्कराज द्वि. से चालुक्य राजा तैलप ने राज्य छीनकर इस राठौड़ राज्य का अंत कर दिया।
मध्य भारत के राठौड़
दक्षिण में जब चालुक्यों का वर्चस्व बढ़ा, तब राष्ट्रकूट के अंतिम राजा कर्कराज के वंशज ने दक्षिण छोड़कर उत्तर में बदायूं में राठौर राज स्थापित किया। तब से राठौर नाम को मान्यता प्राप्त है। बदायूं से मिले एक शिलालेख के अनुसार 'इस नगर का पहला राजा राठौड़ चन्द्र हुआ ! उसका पुत्र विग्रहपाल बड़ा प्रतापी हुआ। उसके बाद भुवनपाल, गोपाल, मदनपाल (वि सं 1176), देवपाल, भीमपाल, शूरपाल व लखनपाल हुए।' यह शिलालेख लखनपाल का है। श्रावस्ती से में संवत 1176 के लेख के अनुसार वास्तव्य वंशी विद्याधर मदनपाल का मंत्री था। उसका पिता जनक, राजा गोपाल का मंत्री था।
बारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में बदायूं के राष्ट्रकूट राजा गोपाल ने प्रतिहारों से कन्नौज छीन लिया। उपरोक्त मदनपाल के वंशज सम्भवतः गोविंदचंद्र, विजयचंद्र, जयचन्द्र हुए। कन्नौज नरेश जयचन्द के वंशज क्रमशः वरदाई सेन, सेतराम व सीहाजी हुए।
(संकलन - घनश्यामसिंह चंगोई)
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राजपुताना में राठोड़ों का आगमन
राजपुताना में राठोड़ों का आगमन
(By - घनश्यामसिंह चंगोई)
राठौड़ अयोध्या के राजा श्रीराम के पुत्र कुश के वंशज हैं। अयोध्या के बाद कौशाम्बी, फिर पालगढ़ व फिर कन्नौज राठोड़ों की मुख्य राजधानी रही।
राव सींहाजी :-
मारवाड़ के राठौड़ राजवंश के मूल पुरूष राव सींहा थे। मध्य भारत के कन्नौज व बदायूं के राठौड़ राज्यों के मोहम्मद गोरी के हाथों पराभव होने के लगभग आधी सदी बाद 1292 (विक्रम सम्वत) में राजा जयचंद के प्रपोत्र कन्नोज के सेतराम जी के आठ पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र राव सिंहा मध्य भारत से अपने सैनिकों के साथ द्वारिका की तीर्थ यात्रा करने के लिए आये। द्वारिका से पुष्कर की ओर जाते समय पाली के धनाढ्य पालीवाल ब्राह्मणों की मुस्लिम लुटेरों के लुटपाट और अत्याचारों से सुरक्षा करके सहायता की। इसी प्रकार भीनमाल में भी प्रजा को वहां के मुस्लिम शासक के अत्याचारों से मुक्त करवाया। पाली व भीनमाल पर अपना शासन स्थापित करने के बाद इन्होने निकटस्थ बालेचा, मोहिल तथा गोहिल राजपूतों को अपने अधीन किया। पाली के समीप बिठू नामक ग्राम की अरणियाली नाडी के तट पर वि. सं. १३३० (1273 ई.) कार्तिक कृष्णा द्वादशी को राव सीहाजी मुसलमानों से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुये। राव सिंहा ने अपना सम्पूर्ण जीवन गौ, ब्राम्ह्यण और मातृभूमि हितार्थ में व्यतीत किया। इन्होंने अपने जीवनकाल में 52 युद्ध किये तथा सभी युद्धों में विजयश्री का वरण किया। इस प्रकार राव सिंहाजी राजस्थान में राठौड़ वंश के स्वतंत्र साम्राज्य के संस्थापक थे
सेतराम सम्राट के, पुत्र अस्ट महावीर ।
जिसमे ‘सींहों’ जेस्ठ सूत, महारथी रणधीर।।
बारह सो के बानवे पाली कियो प्रवेश।
‘सीहा’ कनवज छोड़ न आया मुरधर देश।।
वंशक्रम : राजा जयचंद -> बरदाईसेन -> सेतराम -> सींहाजी (सिंहसेन)
★राव सींहाजी - पाली के राव 1226/1273 (रानी सोलंकीजी) मृत्यु १२७३ ई. पुत्र 3 ...
- अस्थानजी (खेड़ के शासक हुए)
- सोनगजी- सोनग ने ईडर पर अधिकार जमाया। अतः इडर के नाम से सोनग के वंशज ईडरिया राठोड़ कहलाये। अन्य वंशज हस्तीकुण्डी (हटुंडी) में रहे, वे हटूंडीया राठोड़ कहलाये। सोनग के वंशज क्रमशः अभयजी, सोहीजी, मेहपाल जी, भारमल जी, व चूंडारावजी हुए। चूंडाराव अमरकोट के सोढा राणा सोमेश्वर के भांजे थे। इनके समय मुसलमान ने जोर लगाया की अमरकोट के सोढा हमारे से बेटी व्यवहार करें। तब चूंडाराव जो उस समय अमरकोट थे। इनकी सहायता से मुसलमान की बारातें बुलाई गयी एवं स्वयं इडर से सेना लेकर पहुंचे सोढों और राठोड़ों ने मिलकर मुसलमानों की बरातों को मार दिया। उस समय वीर चूंडराव को दू:हठ की उपाधि दी गयी थे अतः चूंडराव के वंशज दोहठ राठौड़ कहे गए। दोहठ राठोड़ अमरकोट, सोराष्ट्र, कच्छ, बनास कांठा, जालोर, बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर जिलों में कहीं-2 निवास करते रहे है।
- अजाजी- सीहाजी के छोटे पुत्र अजाजी के दो पुत्र बेरावली और बीजाजी ने द्वारका के चावड़ो को बाढ़ कर (काट कर) द्वारका पर अपना राज्य कायम किया। इसी कारन बेरावलजी के वंशज बाढ़ेल राठोड़ हुए। आजकल ये बाढ़ेर राठोड़ कहलाते है। गुजरात में पोसीतरा, आरमंडा, बेट द्वारका बाढ़ेर राठोड़ों के ठिकाने थे। दूसरे पुत्र बीजाजी के वंशज बाजी राठोड़ कहलाये है। गुजरात में महुआ, वडाना, आदी इनके ठिकाने हे। बाजी राठोड़ आज भी गुजरात में ही बसते है।
★राव आस्थानजी- (खेड़ के प्रथम राव 1273/1292) उन्होंने गोहिल राजपूतों से खेड़ को जीतकर वहां अपना राज्य कायम किया ! खेड़ के नाम से इनके वंशज खेड़ेचा राठौड़ कहलाये। 5 पुत्र हुए ...
- धुहड़ - खेड़ के मालिक हुए।
- चाचक : - चाचक के वंशज चाचक राठोड़ कहलाये।
- भूपसी
- धांधल - आस्थान के पुत्र धांधल के वंशज धांधल राठोड़ कहलाये। पाबूजी राठोड़ इसी खांप के थे। इन्होने चारणी को दीये गए वचनानुसार पणीग्रहण संस्कार को बीच में छोड़कर चारणी के गायों को बचाने के प्रयास में शत्रु से लड़ते हुए वीर गति प्राप्त की। यही पाबुजी लोक देवता के रूप में पूजे जाते है।
- जोपसी - जोपसी के वंशज जोरावत राठोड़ हुए। जोपसी के 8 पुत्रो से --
(i) जोलू राठौड़ :- जोपसी के पुत्र जोलू के वंशज जोलू राठौड़ हुए।
(ii) सिंधल राठोड़ :- जोपसी के पुत्र सिंधल के वंशज। ये बड़े पराक्रमी हुए, इनका जेतारण पाली पर अधिकार था। जोधा के पुत्र सूजा ने बड़ी मुश्किल से उन्हें वहां से हटाया।
(iii) उहड़ राठोड़ :- जोपसी के पुत्र उहड़ के वंशज।
(iv) मुलु राठोड़ :- जोपसी के पुत्र मुलु के वंशज।
(v) बरजोर राठोड़ :- जोपसी के पुत्र बरजोड के वंशज
(vi) रेकवाल राठोड़ :- जोपसी के पुत्र राकाजी के वंशज है। ये मल्लारपुर , बाराबकी , रामनगर , बड़नापुर , बहराईच उत्तरप्रदेश में है।
(vii) बागड़ीया राठोड़ :- जोपसी के पुत्र रैका से रैकवाल हुए। इन्ही में एक विक्रम के वंशज बागड़ (बांसवाड़ा) में बसने से बागड़िया राठौड़ कहलाये।
(viii) खोपसा राठोड़ :- जोपसी के पुत्र खीमसी के वंशज।
★राव धुहड़ - खेड़ के राव (1292/1309) ! उन्होंने राव सिंधल के साथ मारवाड़ पर नियंत्रण के लिए संघर्ष किया ! इससे पहले धुहड़ ने माता चक्रेश्वरी की प्रतिमा लाकर बाड़मेर के पचपदरा परगने के गांव नागाणा में स्थापित की। इस माताजी को राठौड़ वंश के क्षत्रिय "नागणेची माता" के नाम से कुलदेवी के रूप में पूजने लगे। राव धुहड़ ने पड़ौसी शासकों से 150 गांवों के क्षेत्रों को विजित कर राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। इनके वंशज धुहड़ीया राठोड़ कहलाये) 5 पुत्र ...
- रायपाल- (खेड़ के मालिक हुए)
- कीर्तिपाल
- बेहड़ (बाघमार) - :- इन के वंशज बेहड़ राठोड़ हुए ।
- उनड़ :- उनड़ के वंशज उनड़ राठोड़।
- पीथड़ :- पीथड़ के वंशज पीथड़ राठोड़ हुए।
★राव रायपाल जी- खेड़ के राव (1309-1313) राव रायपाल ने प्रतिहारों पर आक्रमण करके मंडोर पर अधिकार किया, परन्तु कुछ दिनों बाद प्रतिहारो ने मंडोर पर पुनः अधिकार कर लिया। इसके बाद रायपाल ने परमारों के मालानी क्षेत्र को विजित किया तथा इसके आस-पास के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इनके 11 पुत्र --
- कान्हपाल - खेड़ के राव हुए।
- केलण - इन के पुत्र कोटा के वंशज कोटेचा हुए। (बीकानेर जिले में करना, चंडीवाल, हरियाणा में नाथूसरी व भूचामंडी, पंजाब में रामसरा आदी इनके गाँव है।) केलण के पुत्र थांथी के पुत्र फिटक के वंशज फिटक राठोड़ हुए।
- सुंडा :- वंशज सुंडा राठोड़ हुए ।
- महीपाल- वंशज महीपाल राठोड़ हुए।
- शिवराज- वंशज शिवराजोत राठोड़ हुए ।
- डांगी :- डांगी के वंशज डांगी हुए।
- मोहन :- रायपाल के पुत्र मोहन ने ऐक महाजन की पुत्री से शादी की। इस कारन उसके वंशज मुहणोत ओसवाल कहलाये। मुहणोत नेंणसी (ख्यात लेखक) इसी खांप से थे।
- मापा- वंशज मापावत राठोड़ हुए ।
- लूका - वंशज लूका राठोड़ हुए।
- रजक:- रजक के वंशज रजक राठोड़ हुए।
- विक्रम - वंशज विक्रमायत राठोड़ हुए।
★राव कान्हपाल जी- खेड़ के राव (1313-1323) ! इनके समय में भाटियों के राज्य जैसलमेर की सीमा राठौडो़ के क्षेत्र खेड़ व महेवा से लगने के वजह से इनमें परस्पर युद्ध होते रहते थे। कानपाल के पुत्र भीम ने राठौड़ो व भाटियों के मध्य सीमा क्षेत्र नियत की, लेकिन कुछ समय बाद कानपाल व उसका पुत्र भीम भाटियों की सेनाओं से संघर्ष करते हुए काम आये। तीन पुत्र …
- जालणसी - खेड़ के राव हुए।
- विजेपाल
- भीम
★राव जालणसी - खेड़ के राव (1323-1328) ! इसने खेड़ राज्य पर चढ़ाई करने वाले मुस्लिम आक्रांता हाजी मलिक को युद्ध में मार दिया। इसके बाद इसने भीनमाल के सोलंकी राजपूतों पर विजय प्राप्त की। जालणजी 1328 ई. में भाटी व मुस्लिमों की संयुक्त सेना से युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ। राव जालणसी के तीन पुत्र-
- राव छाडा खेड़ के राव हुए।
- जलखा,
- वनराय - इन के वंशज वानर राठोड़ कहलाये। घड़सीसर (बीकानेर राज्य) में है।
★राव छाडा जी- खेड़ के राव (1328-1344) ! इसने उमरकोट के सोढ़ो व जैसलमेर के भाटियों को पराजित किया तथा जालौर व नागौर के मुस्लिम शासकों को दबाए रखा। लेकिन कुछ समय बाद देवड़ा व सोनगरा चौहानों के अचानक घेरकर हमला करने से इनकी मृत्यु हो गयी। राव छडाजी के पुत्र -
- राव तिड़ा- खेड़ के राव हुए
- खोखर - वंशज खोखर राठोड़ कहलाये
- सिंहमल- वंशज सिंहमलोत राठोड़ कहलाये
★राव तिडा जी - खेड़ के राव (1344-1357) ! तिड़ाजी ने महेवा की गद्दी पर बैठने के पश्चात् राठौड़ो की शक्ति को संगठित किया। इनके समय में मारवाड़ के अधिकांश क्षेत्रों पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। सन् 1357 ई. में राव तिड़ाजी मुस्लिम सेना से सिवाने की रक्षा के लिए युद्ध करते हुए काम आये। राव तीड़ा के तीन पुत्र --
- सलखा - महेवा के राव बने !
- कान्हड़ - खेड़ की गद्दी पर बैठे !
- त्रिभुवनसी -
★राव सलखा - महेवा के राव (1357 से 1374 ईस्वी) ! बाड़मेर का महेवा क्षेत्र सलखा के पिता टीडा के अधिकार में था | विक्रमी संवत 1414 में मुस्लिम सेना का आक्रमण हुआ | सलखा को केद कर लिया गया | केद से छूटने के बाद विक्रमी संवत 1422 में आपने श्वसुर राणा रूपसी पड़िहार की सहायता से महेवा को वापिस जीत लिया | विक्रमी संवत 1430 में मुसलमानों का फिर आक्रमण हुआ | सलखा ने वीर गति पायी | नेणसी व कुछ अन्य इतिहासकारो के अनुसार टीडा जी के उत्तराधिकारी राव कान्हड़जी हुए। उन्होंने सलखाजी को सिवाना के समीप एक गांव की जागीर दी। बाद में जब महेवा पर मुस्लिमों का अधिकार हो गया, तो सलखाजी ने महेवा के कुछ भाग पर आक्रमण कर भिरड़कोट में अपना राज्य स्थापित किया, लेकिन कुछ समय बाद मुसलमानों ने महेवा पर चढ़ाई करके उसे मार डाला। इनके वंशज सलखावत राठौड़ हुए। पुत्र 4 ....
- मल्लिनाथ
- जैतमाल- (बानोल, केलवा और गुढामलानी सहित जैतमालोत राठौड़ के पूर्वज)
- वीरम देव- खेड़ के राव हुए।
- शोभित-, उन्होंने अपने भाई राव वीरमदेव की हत्या का बदला लिया और आगामी युद्ध में मृत्यु का सामना किया; वह सोहड़ राठौर के पूर्वज व सोहड़ावाटी के संस्थापक थे, जिसमें सोहरा, मेलाना, फोर्ट सिवाना (1426 से 1515) और मदला के ठाकुर शामिल थे।
★रावल मल्लिनाथजी- मालानी के राव ! सलखा के पुत्र मल्लिनाथ बड़े प्रसिद्ध हुए। इन्होने मुसलमानों से सिवाना का किला जीता और अपने छोटे भाई जैतमाल को दे दिया, व् छोटे भाई वीरम को खेड़ की जागीरी दे दी| नगर व् भिरड़ गढ़ के किले भी मल्लिनाथ ने अधिकार में किये | मलिनाथ शक्ति संचय कर राठोड़ राज्य का विस्तार करने और हिन्दू संस्कृति की रक्षा करने पर तुले रहे | उन्होंने मुसलमानों के आक्रमण को विफल किया | मल्लिनाथ और उनकी राणी रुपादें नाथ संप्रदाय में दीक्षित हुए और ये दोनों सिद्ध माने गए। मल्लिनाथ के जीवन काल में हि उनके पुत्र जगमाल को गादी मिली। इनके महेचा राठौड़ हुए) ! इनके उत्तराधिकारी (क्रमशः)…
- मालानी के राव जगमाल
- मालानी के राव लुनका
- बाड़मेर के रावल खेत सिंह
- बाड़मेर के रावल विजय सिंह
- बाड़मेर के रावल पंचराज सिंह
- बाड़मेर के रावल धनराज सिंह
- ठाकुर मान सिंह, (उन्हें इंद्रोई का ठिकाना दिया गया था)
★राव वीरमदेव - खेड़ के राव ! रावल मल्लीनाथ का छोटा भाई वीरमजी (विरमदेव) खेड़ मे रहा करते थे। वीरमजी ने 1383 ई. में जोहियों के राज्य पर अधिकार करने के लिए प्रयास किया, जहां दल्ला जोहिया के साथ युद्ध में इनकी मृत्यु हो गयी। इनके पांच पुत्र हुए …
- चूंडा - (राव चूंडा मंडोर के शासक हुए)
- बीजै राव - बिजावत वंश के पूर्वज
- गोगादे- वंशज गोगादे राठौड़ हुए।
- जयसिंह - वंशज जैसिंघदे राठौड़ हुए।
- देवराज- वंशज देवराजोत व उसके पुत्र के चाड़देवोत राठोड़ हुए।
★राव चूंडाजी- मंडोर के प्रथम राठौड़ शासक हुए !
(इससे आगे का विवरण "मंडोर व जोधपुर राज्य" शीर्षक के अन्तर्गत पेज पर दिया गया है )
(नोट- अपने सुझाव व संशोधन नीचे दिए वाट्सएप नम्बर पर भेज सकते हैं)
घनश्यामसिंह राजवी चंगोई
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राठोड़ वंश के गोत्राचार
राठौड़ वंश की उपशाखाएं (खांप)
राठौड़ वंश की शाखाएं व उपशाखाएं
(संकलन - घनश्यामसिंह राजवी चंगोई) राठौड़ों की सम्पूर्ण भारत में कुल 13 मुख्य शाखाएं हैं ... 1.दानेश्वरा, 2.अभेपुरा, 3.कपालिया, 4.कुरहा, 5.जलखेड़ा, 6.बुगलाणा, 7.अहर, 8.पारकरा, 9.चंदेल, 10.वीर, 11.दरियावरा, 12.खरोदिया, 13.जयवंशी (दहिया) इनमें से राजस्थान में मात्र दानेश्वरा (दानेसरा) शाखा के राठौड़ हैं। जिनकी निम्नांकित उप शाखाएं हैं ... 1.महेचा राठौड़ (4 उप शाखाए) 2.जौधा राठौड़ (45 उप शाखाएँ) 3.बीका राठौड़ (26 उप शाखाएं) 4.मेड़तिया राठौड़ (26 उप शाखाएँ) 5. कांधलोत राठौड़ (4 उप शाखाएं) 6.चांपावत राठौड़ (15 उप शाखाएँ) 7.मण्डलावत राठौड़ (13 उप शाखाएँ) 8.रूपावत राठौड़ (7 उप शाखाएँ है) 9.बीदावत राठौड़ (22 उप शाखाएँ) 10.उदावत राठौड़ 11.बनीरोत राठौड़ (11 उप शाखाए) 12.इडरिया राठोड़ 13.हटुण्डिया राठौड़ 14.बरजोर राठौड़ 15.जोरावर राठौड़ 16.रैकवार राठौड 17.बागडिया राठौड 18.छप्पनिया राठौड 19.साल राठौड 20.खोपसा राठौड 21.सिवी राठौड़ 22.पीथड़ राठौड़ 23.कोटेचा राठौड़ 24.बहड़ राठौड़ 25.ऊनड़ राठौड़ 26.फिटक राठौड़ 27.सुण्डा राठौड़ 28.महिपाल राठौड़ 29.शिवराज राठौड़ 30.डांगी राठौड 31.मुहणोत राठौड़ 32.मापावत राठौड़ 33.लूका राठौड़ 34.राजू राठौड़ 35.विक्रम राठौड़ 36.भोवोत राठौड़ 37.बांदर राठौड़ 38.उडा राठौड़ 39.खोखर राठौड़ 40.मकलोत राठौड़ 41.बिठवासा राठौड़ 42.सलखावत राठौड़ 43.जैतमालोत राठौड़ 44.जुंजाणी राठौड़ 45.राधा राठोड 46.भादावत राठौड़ 47.पोकरणा राठौड़ 48.बाडमेरा राठोड़ 49.कोरिया राठौड़ 50.खाबडिया राठौड़ 51.गोगादेव राठौड़ 52.देवराजोत राठौड़ 53.चाड़दैवत राठौड़ 54.जैसिंधवे राठौड़ 55.सातावत राठौड़ 56.भीमावत राठौड़ 57.अरड़कमलोत राठौड़ 58.रणधीरोत राठौड़ 59.अर्जुन राठौड़ 60.कानावत राठौड़ 61.पुनावत राठौड़ 62.जैतावत राठौड़ (3 उपशाखाएँ है) 63.कालावत राठौड 64.बाजी राठौड 65.खेड़ा राठौर 66.धुडिया राठौड़ 67.धांधल राठौड़ 68.चाचक राठौड 69.हस्ती राठौड़ 70.गोलू राठौड़ 71.सिंघल राठौड़ 22.उहड़ राठौड 73.गोलू राठौड़ 74.बाढेल (बाढेर) राठौड़ ! (उपरोक्त सभी उपशाखाओं का विस्तृत विवरण नीचे देखें) महेचा राठौड़ (राव मल्लीनाथजी से) चार उप शाखाएँ-- पातावत महेचा
- कालावत महेचा
- दूदावत महेचा
- उगा महेचा
- बरसिंगोत जौधा
- रामावत जौधा
- भारमलोत जौधा
- शिवराजोत जौधा
- रायपालोत जौधा
- करमसोत जौधा
- बणीवीरोत जौधा
- खंगारोत जौधा
- नरावत जौधा
- सांगावत जौधा
- प्रतापदासोत जौधा
- देवीदासोत जौधा
- सिखावत जौधा
- नापावत जौधा
- बाघावत जौधा
- प्रताप सिंहोत जौधा
- गंगावत जौधा
- किशनावत जौधा
- रामोत जौधा
- के सादोसोत जौधा
- चन्द्रसेणोत जौधा
- रत्नसिंहोत जौधा
- महेश दासोत जौधा
- भोजराजोत जौधा
- अभैराजोत जौधा
- केसरी सिंहोत जौधा
- बिहारी दासोत जौधा
- कमरसेनोत जौधा
- भानोत जौधा
- डंूगरोत जौधा
- गोयन्द दासोत जौधा
- जयत सिंहोत जौधा
- माधो दासोत जौधा
- सकत सिंहोत जौधा
- किशन सिंहोत जौधा
- नरहर दासोत जौधा
- गोपाल दासोत जौधा
- जगनाथोत जौधा
- रत्न सिंगोत जौधा
- कल्याणदासोत जौधा
- फतेहसिंगोत जौधा
- जैतसिंहोत जौधा
- रतनोत जौधा
- अमरसिंहोत जौधा
- आन्नदसिगोत जौधा
- पुत्र बाघसिंह के वंशजों से- बणीरोत कांधल, नारायण दासोत कांधल, रायमलोत कांधल !
- पुत्र राजसिंह के वंशजों से- रावरोत कांधल, जसवन्तदासोत कांधल, गोपालदासोत कांधल, राधोदासोत कांधल, बिसनदासोत कांधल।
- पुत्र अड़कमलजी से - अड़कमलोत कांधल, सांइदासोत कांधल।
- पुत्र पूर्णमलजी से पूर्णमलोत कांधल।
- पुत्र पर्वतजी से परवतोत कांधल।
- पुत्र सूरोजी से सुरावत कांधल।
- भाखरोत बाला राठौड़
- पाताजी राठौड़
- रूपावत राठौड़
- करणोत राठौड़
- माण्डणोत राठौड़
- नाथोत राठौड़
- सांडावत राठौड़
- बेरावत राठौड़
- अड़वाल राठौड़
- खेतसिंहोत राठौड़
- लाखावत राठौड़
- डूंगरोत राठौड़
- भोजराजोत राठौड़
- संगतसिंहोत चांपावत
- रामसिंहोत चांपावत
- जगमलोत चांपावत
- गोयन्द दासोत चांपावत
- केसोदासोत चांपावत
- रायसिंहोत चांपावत
- रायमलोत चांपावत
- विठलदासोत चांपावत
- बलोत चांपावत
- हरभाणोत चांपावत
- भोपतोत चांपावत
- खेत सिंहोत चांपावत
- हरिदासोत चांपावत
- आईदानोत चांपावत
- किणाल दासोत चांपावत
- जयमलोत मेड़तिया
- सुरतानोत मेड़तिया
- केशव दासोत मेड़तिया
- अखैसिंहोत मेड़तिया
- अमरसिंहोत मेड़तिया
- गोयन्ददासोत मेड़तिया
- रघुनाथ सिंहोत मेड़तिया
- श्यामसिंहोत मेड़तिया
- माधोसिंहोत मेड़तिया
- कल्याण दासोत मेड़तिया
- बिशन दासोत मेड़तिया
- रामदासोत मेड़तिया
- बिठलदासोत मेड़तिया
- मुकन्द दासोत मेड़तिया
- नारायण दासोत मेड़तिया
- द्वारकादासोत मेड़तिया
- हरिदासोत मेड़तिया
- शार्दूलोत मेड़तिया
- अनोतसिंहोत मेड़तिया
- ईशर दासोत मेड़तिया
- जगमलोत मेड़तिया
- चांदावत मेड़तिया
- प्रतापसिंहोत मेड़तिया
- गोपीनाथोत मेड़तिया
- मांडणोत मेड़तिया
- रायसालोत मेड़तिया
- पिरथी राजोत जैतावत
- आसकरनोत जैतावत
- भोपतोत जैतावत
- महेशदासोत कूंपावत
- ईश्वरदासोत कूंपावत
- माणण्डणोत कूंपावत
- जोध सिंगोत कूंपावत
- महासिंगोत कूंपावत
- उदयसिंगोत कूंपावत
- तिलोक सिंगोत कूंपावत
- केशवदासोत बीदावत
- सावलदासोत बीदावत
- धनावत बीदावत
- सीहावत बीदावत
- दयालदासोत बीदावत
- घेनावत बीदावत
- मदनावत बीदावत
- खंगारोत बीदावत
- हरावत बीदावत
- भीवराजोत बीदावत
- बैरसलोत बीदावत
- डँूगरसिंगोत बीदावत
- भोजराज बीदावत
- रासावत बीदावत
- उदयकरणोत बीदावत
- जालपदासोत बीदावत
- किशनावत बीदावत
- रामदासोत बीदावत
- गोपाल दासोत
- पृथ्वीराजोत बीदावत
- मनोहरदासोत बीदावत
- तेजसिंहोत बीदावत
- घड़सियोत बीका
- राजसिंगोत बीका
- केलण बीका
- अमरावत बीका
- रतनसिंहोत बीका
- प्रतापसिंहोत बीका
- रामसिंहोत बीका
- नारणोत बीका
- तेजसिंहोत बीका
- नीबावत बीका
- भीमराजोत बीका
- बाघावत बीका
- मानसिंहोत बीका
- श्रृगोंत बीका
- गोपालदासोत बीका
- पृथ्वीराजोत बीका
- किशनहोत बीका
- अमरसिंहोत बीका
- बिसावत बीका
- राजवी बीका
- मेघराजोत बनीरोत
- मेकरणोत बनीरोत
- मेदसिंहोत
- महेशदासोत
- रामचंद्रोत
- अचलदासोत बनीरोत
- सूरजसिंहोत बनीरोत
- जयमलोत बनीरोत
- प्रतापसिंहोत बनीरोत
- भोजराजोत बणीरोत
- चत्रसालोत बनीरोत
- नथमलोत बनीरोत
- धीरसिंगोत बनीरोत
- हरिसिंगोत बनीरोत
- ईडरिया राठोड़ :- सीहाजी के पुत्र सोनग ने ईडर पर अधिकार जमाया। अतः इडर के नाम से सोनग के वंशज ईडरिया राठोड़ कहलाये।
- हटूंडिया राठोड़ :- सोनग के वंशज हस्तीकुण्डी (हटुंडी) में रहे, वे हटूंडीया राठोड़ कहलाये |
- दोहठ राठोड़ - सोनग के वंशज क्रमशः अभयजी, सोहीजी, मेहपाल जी, भारमल जी, व चूंडारावजी हुए। चूंडाराव अमरकोट के सोढा राणा सोमेश्वर के भांजे थे | इनके समय मुसलमान ने जोर लगाया की अमरकोट के सोढा हमारे से बेटी व्यवहार करें | तब चूंडाराव जो उस समय अमरकोट थे | इनकी सहायता से मुसलमान की बारातें बुलाई गयी एवं स्वयं इडर से सेना लेकर पहुंचे सोढों और राठोड़ों ने मिलकर मुसलमानों की बरातों को मार दिया | उस समय वीर चूंडराव को दू:हठ की उपाधि दी गयी थे अतः चूंडराव के वंशज दोहठ कहे गए | ये राठोड़ अमरकोट, सोराष्ट्र, कच्छ, बनास कांठा, जालोर, बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर जिलों में कहीं-2 निवास करते रहे है |
- बाजी राठोड़ :- बेरावल जी के भाई बीजाजी के वंशज बाजी राठोड़ कहलाये है | गुजरात में महुआ, वडाना, आदी इनके ठिकाने हे| बाजी राठोड़ आज भी गुजरात में ही बसते है |
- खेड़ेचा राठोड़ :- सीहा के पुत्र आस्थान ने गुहिलों से खेड़ जीता | खेड़ नाम से आस्थान के वंशज खेड़ेचा राठोड़ कहलाते है |
- धुहड़ीया राठोड़ :- आस्थान के पुत्र धूहड़ के वंशज धुहड़ीया राठोड़ कहलाये |
- धांधल राठोड़ :- आस्थान के पुत्र धांधल के वंशज धांधल राठोड़ कहलाये | पाबूजी राठोड़ इसी खांप के थे | इन्होने चारणी को दीये गए वचनानुसार पणीग्रहण संस्कार को बीच में छोड़कर चारणी के गायों को बचाने के प्रयास में शत्रु से लड़ते हुए वीर गति प्राप्त की| यही पाबुजी लोक देवता के रूप में पूजे जाते है |
- चाचक राठोड़ : - आस्थान के पुत्र चाचक के वंशज चाचक राठोड़ कहलाये |
- हरखावत राठोड़ :- आस्थान के पुत्र हरखा के वंशज।
- जोलू राठोड़ :- आस्थान के पुत्र जोपसा के पुत्र जोलू के वंशज।
- सिंधल राठोड़ :- जोपसा के पुत्र सिंधल के वंशज। ये बड़े पराक्रमी हुए। इनका जेतारण पाली पर अधिकार था। जोधा के पुत्र सूजा ने बड़ी मुश्किल से उन्हें वहां से हटाया।
- उहड़ राठोड़ :- जोपसा के पुत्र उहड़ के वंशज।
- मुलु राठोड़ :- जोपसा के पुत्र मुलु के वंशज।
- बरजोर राठोड़ :- जोपसा के पुत्र बरजोड के वंशज।
- जोरावत राठोड़ :- जोपसा के वंशज।
- रेकवाल राठोड़ :- जोपसा के पुत्र राकाजी के वंशज है। ये मल्लारपुर , बाराबकी , रामनगर , बड़नापुर , बहराईच उत्तरप्रदेश में है।
- बागड़ीया राठोड़ :- आस्थान जी के पुत्र जोपसा के पुत्र रैका से रैकवाल हुए। इन्ही में एक विक्रम के वंशज बागड़ (बांसवाड़ा) में बसने से बागड़िया राठौड़ कहलाये।
- छप्पनिया राठोड़ :- मेवाड़ से सटा हुआ मारवाड़ की सीमा पर छप्पन गाँवो का क्षेत्र छप्पन का क्षेत्र है | यहाँ के राठोड़ छप्पनिया राठोड़ कहलाये | यह खांप बागदीया राठोड़ों से निकली है। उदयपुर रियासत में कणतोड़ गाँव की जागीरी थी।
- आसल राठोड़ :- आस्थान के पुत्र आसल के वंशज आसल राठोड़ कहलाये।
- खोपसा राठोड़ :- आस्थान के पुत्र जोपसा के पुत्र खीमसी के वंशज।
- सिरवी राठोड़ :- आस्थान के पुत्र धुहड़ के पुत्र शिवपाल के वंशज।
- पीथड़ राठोड़ :- आस्थान के पुत्र पीथड़ के वंशज।
- कोटेचा राठोड़ :- आस्थान के पुत्र धुहड़ के पुत्र रायपाल हुए। रायपाल के पुत्र केलण के पुत्र कोटा के वंशज कोटेचा हुए। बीकानेर जिले में करनाचंडीवाल , हरियाणा में नाथूसरी व भूचामंडी, पंजाब में रामसरा आदी इनके गाँव है।
- बहड़ राठोड़ :- धुहड़ के पुत्र बहड़ के वंशज।
- उनड़ राठोड़ :- धुहड़ के पुत्र उनड़ के वंशज।
- फिटक राठोड़ :- रायपाल के पुत्र केलण के पुत्र थांथी के पुत्र फिटक के वंशज फिटक राठोड़ हुए।
- सुंडा राठोड़ :- रायपाल के पुत्र सुंडा के वंशज।
- शिवराजोत राठोड़ :- रायपाल के पुत्र शिवराज के वंशज।
- डांगी :- रामपाल के पुत्र डांगी के वंशज ढोलिन से शादी की अथवा इनके वंशज ढोली हुए।
- मोहनोत :- रायपाल के पुत्र मोहन ने ऐक महाजन की पुत्री से शादी की। इस कारन उसके वंशज मुहणोत ओसवाल कहलाये मुहणोत नेंणसी (ख्यात लेखक) इसी खांप से थे।
- मापावत राठोड़ :- रायपाल के वंशज मापा के वंशज।
- लूका राठोड़ :- रायपाल के वंशज लूका के वंशज।
- राजक:- रायपाल के वंशज रजक के वंशज।
- विक्रमायत राठोड़ :- रायपाल के पुत्र विक्रम के वंशज।
- भोंवोत राठोड़ :- रायपाल के पुत्र भोवण के वंशज।
- बांदर राठोड़ :- रायपाल के पुत्र कानपाल हुए, कानपाल के जालण और जालण के पुत्र छाडा के पुत्र बांदर के वंशज बांदर राठोड़ कहलाये। घड़सीसर (बीकानेर राज्य) में बताते है।
- ऊना राठोड़ :- रायपाल के पुत्र ऊडा के वंशज।
- खोखर राठोड़ :- छाडा के पुत्र खोखर के वंशज। खोखर ने सांकडा , सनावड़ा आदी गाँवो पर अधिकार किया और खोखर गाँव (बाड़मेर) बसाया। अलाउद्दीन खिलजी ने सातल दे के समय सिवाना पर चढ़ाई की तब खोखर जी सातल दे के पक्ष में वीरता के साथ लड़े और युद्ध मे काम आये। खोखर राठौड़ जिन गाँवो में रहते है :- जैसलमेर जिले में , निम्बली , कोहरा , भाडली , झिनझिनयाली , मूंगा , जेलू , खुडियाला , आस्कंद्र, भादरिया , गोपारयो, भलरीयो , जायीतरा, नदिया बड़ा , अडवाना, सांकडा ,पालवा ,सनावड़ा , खीखासरा , कस्वा चुरू - रालोत जोगलिया। बाड़मेर में - खोखर शिव , खोखर पार। जोधपुर में - जुंडदिकयी, खुडियाला , खोखरी पाला , बिलाड़ा। नागोर में खोखरी पाली - बाली , गंदोग , खोखरी पाला , बिलाड़ा।
- सिंहमलोत राठोड़ :- छाडा के पुत्र सिंहमल के वंशज।
- बीठवासा उदावत राठोड़ :- रावल टीडा के पुत्र कानड़दे के पुत्र रावल के पुत्र त्रिभवन के पुत्र उदा की बीठवास जागीर में था| अतः उदा के वंशज बीठवासिया उदावत कहलाये | उदाजी के पुत्र बीरम जी बीकानेर रियासत के साहुवे गाँव से आये | जोधाजी ने उनको बीठवसिया गाँव के जागीर दी | इस गाँव के आलावा वेग्डीयो और धुनाड़ीया गाँव भी इनकी जागीरी में थे।
- सलखावत राठोड़ :- छाडा के पुत्र टीडा के पुत्र सलखा के वंशज सल्खावत राठोड़ कहलाये।
- जैतमालोत राठोड़ :- सलखा के पुत्र जैतमाल के वंशज जैत्मालोत राठोड़ कहलाये। बीकानेर में कहीं कहीं निवास करते है।
- जूजाणीया राठोड़ :- जैतमाल के पुत्र खेतसी के वंशज है। गाँव थापाणा इनकी जागीर में था।
- राड़धरा राठोड़ :- जैतमाल के पुत्र खिंया ने राड़धरा पर अधिकार किया। अतः इनके वंशज राड़धरा कहलाये।
- महेचा राठोड़ :- सलखा राठोड़ के पुत्र मल्लिनाथ बड़े प्रसिद्ध हुए | बाड़मेर का महेवा क्षेत्र सलखा के पिता टीडा के अधिकार में था | विक्रमी संवत 1414 में मुस्लिम सेना का आक्रमण हुआ | सलखा को केद कर लिया गया | केद से छूटने के बाद विक्रमी संवत14२२ में आपने श्वसुर राणा रूपसी पड़िहार की सहायता से महेवा को वापिस जीत लिया | विक्रमी संवत 1430 में मुसलमानों का फिर आक्रमण हुआ | सलखा ने वीर गति पायी | सलखा के स्थान पर ( माला ) मल्लिनाथ राज्य का स्वामी हुआ | इन्होने मुसलमानों से सिवाना का किला जीता और अपने आपने छोटे भाई जैतमाल को दे दिया | व् छोटे भाई वीरम को खेड़ की जागीरी दे दी| नगर व् भिरड़ गढ़ के किले भी मल्लिनाथ ने अधिकार में किये | मलिनाथ शक्ति संचय कर राठोड़ राज्य का विस्तार करने और हिन्दू संस्कृति की रक्षा करने पर तुले रहे | उन्होंने मुसलमानों के आक्रमण को विफल किया | मल्लिनाथ और उनकी राणी रुपादें , नाथ संप्रदाय में दिक्सीत हुए और ये दोनों सिद्ध माने गए | मल्लिनाथ के जीवन काल में हि उनके पुत्र जगमाल को गादी मिल गयी |जगमाल भी बड़े वीर थे | गुजरात का सुल्तान तीज पर इक्कठी हुयी लड़कियों को हर ले गया | तब जगमाल अपने योधाओं के साथ गुजरात गए और सुल्तान की पुत्री गीन्दोली का हरण कर लाया तब राठोड़ों और मुसलमानों में युद्ध हुआ | इस युद्ध में जगमाल ने बड़ी वीरता दिखाई | कहा जाता हे की सुल्तान के बीबी को तो युद्ध में जगह - जगह जगमाल हि दिखयी दिया। पग पग नेजा पाड़ीया , पग -पग पाड़ी ढाल|बीबी पूछे खान ने , जंग किता जगमाल ||इन्ही जगमाल का महेवा पर अधिकार था | इस कारन इनके वंशज महेचा कहलाते है |जोधपुर परगने में थोब , देहुरिया , पादरडी, नोहरो आदी इनके ठिकाने है। उदयपुर रियासत में नीबड़ी व् केलवा इनकी जागीर में थे| उनकी खाँपे निम्न है ..१. पातावत महेचा :- जगमाल के पुत्र रावल मंडलीक के बाद कर्मश भोजराज , बीदा, नीसल , हापा , मेघराज व् पताजी हुए | इन्ही के वंशज पातावत कहलाये जालोर और सिरोही में इनके कई गाँव है। २. कलावत महेचा :- मेघराज के पुत्र कल्ला के वंशज।३. दूदावत महेचा :- मेघराज के पुत्र दूदा के वंशज।४. उगा :- वरसिंह के पुत्र उगा के वंशज।
- बाड़मेरा राठोड़ :- मल्लिनाथ के छोटे पुत्र अरड़कमल ने बाड़मेर इलाके नाम से इनके वंशज बाड़मेरा राठोड़ कहलाये। इनके वंशज बाड़मेर में और कई गाँवो में रहते ह।
- पोकरणा राठोड़ :- मल्लिनाथ के पुत्र जगमाल के जिन वंशजो का पोकरण इलाके में निवास हुआ। वे पोकरणा राठोड़ कहलाये इनके गाँव सांकडा , सनावड़,लूना , चौक , मोडरड़ी , गुडी आदी जैसलमेर में है।
- खाबड़ीया राठोड़ :- मल्लिनाथ के पुत्र जगमाल के पुत्र भारमल हुए| भारमल के पुत्र खीमुं के पुत्र नोधक के वंशज जामनगर के दीवान रहे इनके वंशज कच्छ में है। भारमल के दुसरे पुत्र माँढण के वंशज माडवी कच्छ में रहते है वंशज खाबड़ गुजरात के इलाके के नाम से खाबड़ीया कहलाये | इनके गाँव कुछ राजस्थान के बाड़मेर में रेडाणा और देदड़ीयार है कुछ घर पाकिस्तान में भी हैं।
- कोटड़ीया राठोड़ :- जगमाल के पुत्र कुंपा ने कोटड़ा पर अधिकार किया अतः कुंपा के वंशज कोटड़ीया राठोड़ कहलाये। जगमाल के पुत्र खींव्सी के वंशज भी कोटड़ीया कहलाये इनके गाँव बाड़मेर में , कोटड़ा , बलाई , भिंयाड़ इत्यादि है।
- गोगादे राठोड़ :- सलखा के पुत्र वीरम के पुत्र गोगा के वंशज गोगादे राठोड़ कहलाये। केतु ( चार गाँव ) सेखला ( 15 गाँव ) खिराज, गड़ा आदी इनके ठिकाने है।
- देवराजोत राठोड़ :- बीरम के पुत्र देवराज के वंशज देवराजोत राठोड़ कहलाये। सेतरावो इनका मुख्या ठिकाना है। इसके आलावा सुवालिया आदी ठिकाने थे ।
- चाड़देवोत राठोड़ :- वीरम के पुत्र व् देवराज के पुत्र चाड़दे के वंशज चाड़देवोत राठोड़ कहलाये। जोधपुर परगने का देचू इनका मुख्या ठिकाना था। गीलाकोर में भी इनकी जागीरी थी।
- जेसिधंदे राठोड़ :- वीरम के पुत्र जैतसिंह के वंशज।
- सतावत राठोड़ :- चुंडा वीरमदेवोत के पुत्र सता के वंशज।
- भींवोत राठोड़ :- चुंडा के पुत्र भींव के वंशज। खाराबेरा जोधपुर इनका ठिकाना था।
- अरड़कमलोत राठोड़:- चुंडा के पुत्र अरड़कमल वीर थे। राठोड़ों और भाटियों के शत्रुता के कारन शार्दुल भाटी जब कोडमदे मोहिल से शादी कर लोट रहा था। तब अरड़कमल ने रास्ते में युद्ध के लिए ललकारा और युद्ध में दोनों हि वीरता से लड़े शार्दुल भाटी वीरगति प्राप्त हुए और राणी कोडमदे सती हुयी। अरड़कमल भी उन घावों से कुछ दिनों बाद मर गए। इस अरड़कमल के वंशज अरड़कमल राठोड़ कहलाये।
- रणधीरोत राठोड़ :- चुंडा के पुत्र रणधीर के वंशज है फेफाना इनकी जागीर थी।
- अर्जुनोत राठोड़ :- राव चुंडा के पुत्र अर्जुन के वंशज।
- कानावत राठोड़ :- चुंडा के पुत्र कान्हा के वंशज।
- पूनावत राठोड़ :- चुंडा के पुत्र पूनपाल के वंशज है। गाँव खुदीयास इनकी जागीरी में था।
मारवाड़ (जोधपुर) राज्य
मारवाड़ (जोधपुर) राज्य
(घनश्यामसिंह चंगोई) मण्डोर का प्राचीन नाम ’माण्डवपुर’ था। यह पुराने समय में मारवाड़ राज्य की राजधानी हुआ करती थी। वर्तमान में मंडोर दुर्ग के भग्नावशेष ही बाकी हैं, जो बौद्ध स्थापत्य शैली के आधार पर बना था। इस दुर्ग में बड़े-बड़े प्रस्तरों को बिना किसी मसाले की सहायता से जोड़ा गया था। यह पड़िहार राजाओं का गढ़ था। सैकड़ों सालों तक यहां से पडिहार राजाओं ने सम्पूर्ण मारवाड़ पर अपना राज किया। सन् 1395 में चुंडाजी राठोड की शादी पडिहार राजकुमारी से होने पर मंडोर उन्हे दहेज में मिला, तब से परिहार राजाओं की इस प्राचीन राजधानी पर राठोड शासकों का राज हो गया। मन्डोर रावण की ससुराल होने की किदवन्ति भी है, मगर रावण की पटरानी मन्दोदरी नाम से मिलता नाम के अलावा अन्य कोई साक्ष्य यहाँ उपलब्ध नहीं है। मन्डोर में सदियो से होली के दूसरे दिन राव का मेला लगता है। मेले के स्वरुप व परंपरा आज भी सेकडो साल पुरानी हे। हाल के वर्षो में स्वरुप में जरुर बदलाव हुआ हे, मगर प्रपराओं में बदलाव नहीं हुआ है। मण्डोर का दुर्ग देवल, देवताओं की राल, जनाना, उद्यान, संग्रहालय, महल तथा अजीत पोल दर्शनीय स्थल हैं। मण्डोर साम्प्रदायिक सद्भाव एवं एकता का प्रतीक हैं। तनापीर की दरगाह, मकबरे, जैन मंदिर तथा वैष्णव मंदिर सभी का एक ही क्षेत्र में पाया जाना, इस तथ्य का मजबूत सबूत हैं कि विभिन्नता में एकता यहाँ के जीवन की प्रमुख विशेषता रही हैं। राव चूंडाजी– मंडोर के राठौड़ राज्य के संस्थापक (1406 /1418) रावल मल्लीनाथ के छोटा भाई वीरमजी के जोहियावाड़ में दल्ला जोहिया के हाथों मारे जाने के बाद उनकी रानी अपने 5 वर्ष के पुत्र चुण्डा को आल्हा चारण को सौंप कर सती हो गई थी। आल्हा चारण ने 12 वर्ष का होने पर उसे वीरमदेवजी के भाई मल्लीनाथ को सौंप दिया। रावल मल्लीनाथ जी ने चूंडा राठौड़ को सालोड़ी गांव की जागीर प्रदान की और चूंडा ने उस गांव को अपना केन्द्र बनाकर अपनी राठौड़ वंश के राज्य की सीमा को विस्तार करना शुरू किया। तुर्कों ने इंदा पडिहारों से मंडोर छीन ली थी और वहाँ के सरदार ने सब गाँवों से घास की दो दो गाड़ियाँ मँगवाने का हुक्म दिया था। ईंदों को भी घास भिजवाने की ताकीद आई, तब उन्होंने चूडा से मंडोर लेने की सलाह की। घास की गाड़ियाँ भरवाई और हरेक गाडा में चार चार हथियारबंद राजपूतों को छिपाया। एक हांकनेवाला और एक पीछे पीछे चलने वाता रखा। पिछले पहर को इनकी गाडियाँ मंडोर के गढ़ के बाहर पहुँचीं। गढ़ के दरवाज़े पर एक मुसलमान द्वारपाल भाला पकड़े खड़ा था। जब ये गाड़ियाँ भीतर घुमने लगों तो द्वारपाल ने एक गाड़ी मे भाला यह देखने को डाला कि घास के नीचे कुछ और कपट तो नहीं है। भाले की नोक एक राजपूत के जा लगो, परंतु उसने तुरंत कपड़े से उसे पोछ डाला, क्योंकि यदि उस पर लोहू का चिह्न रह जावे तो सारा भेद खुल पड़े। दरबान ने पूछा क्यो ठाकुरो, सव में ऐसा हो घास है ? कहा हाँजी, और गाड़ियाँ डगडगाती हुई भीतर चली गई, इतने में सध्या हो गई। अँधेरा पडा जो रजपूत छिपे बैठे थे, बाहर निकले, दरवाजा बंद कर दिया और टूट पड़े। सबको काटकर चुण्डा की दुहाई फेर दी। मंडोर और अन्य इलाके से भी तुर्कों को खदेडकर निकाल दिया । एक दूसरा मत भी है कि मण्डोर, ईन्दा (पडियार) शाखा के राजपूतों की राजधानी थी। चुण्डा मंडोर की सेना में भर्ती हो गया। जल्दी ही उसके रणकौशल से वहां के राजा रायधवल इंदा बहुत प्रभावित हुआ व उसे सेनानायक बना दिया। ईन्दा शाखा के राजपूतों ने मण्डोर को यवनों से विजित कर लिया, परन्तु उसकी सुरक्षा करने में असमर्थ थे। अतः मण्डोर के किले को राव चूण्डा को सौंपना उचित समझा। मण्डोर के राजा रायधवल ईन्दा ने अपनी पुत्री लीलादे का विवाह चूंडा से किया और मंडोर का गढ़ दहेज में दिया। उक्त घटना के सम्बन्ध में एक सोरठा आज भी लोक प्रचलित है– ईन्दों रो उपकार, कमधज कदे न वीसरे। चूंडो चंवरी चाढ़, मंडोर दीनी दायजै ।। राव चूंडा ने मण्डोर को अपनी राजधानी बनाया। अतः चूंडा से राठौड़ साम्राज्य का विधिवत् अभ्युदय माना जाता है। मण्डोर प्राप्त हो जाने पर राव चूंडा ने इसमें रहने वाले सिंधल, कोटेचा, मांगलिया, आसायच आदि राजपूतों को अपनी सेवा में रख लिया। राव चूंडाजी ने अपने राज्य का विस्तार करते हुए डीडवाना, खाटू, सांभर, पाली, अजमेर, सोजत, नाडोल और फलौदी को अपने साम्राज्य में मिला लिया। सन् १३९९ ई. में नागौर के खोखर शासक को मारकर नागौर पर अधिकार किया। राव चूंडा मंडोर राज्य को अपने पुत्र सता को सौंपकर स्वयं नागौर में रहने लगा। इसने नागौर के समीप ही चूंडासर नामक गांव बसाया। राव चूंडा का ज्येष्ठ पुत्र रणमल था, परन्तु राव चूंडा अपनी मोहिल रानी के प्रभाव में आकर उसके पुत्र कान्हा को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और अपने ज्येष्ठ पुत्र रणमल से कहा कि वह किसी अन्य राज्य में जाकर रहे। रणमल राठौड़ अपने पिता की आज्ञा मानकर मेवाड़ के महाराणा लाखा की सेवा में चला गया। सन् 1423 ई. में मुहम्मद फिरोज ने नागौर पर अधिकार करने के लिए चढ़ाई की। नागौर में राव चूंडा और मुहम्मद फिरोज के मध्य युद्ध हुआ, जिसमें राव चूंडा युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनके 14 बेटे थे व एक पुत्री हंसादेवी जिसका विवाह मेवाड़ के महाराणा लाखा से किया। पुत्र ...- रिणमल - मंडोर के राव हुए।
- सता - इसके वंशज सत्तावत राठौड़ हुए।
- कान्हा - इसके वंशज कानावत राठौड़ हुए
- भींव - इसके वंशज भींवत राठौड़ हुए। (इनके पुत्र अभाजी 1445 में गुजरात गए (गुजरात मे वनोड़ के तालुकदार इनके वंशज हैं)
- अरडकमल - इसके वंशज अरडकमल राठौड़ हुए।
- रणधीर - इसके वंशज रणधीरोत राठौड़ हुए।
- सहसमल
- अर्जुन - इसके वंशज अर्जुनोत राठौड़ हुए।
- पूँना- इसके वंशज पूनावत राठौड़ हुए।
- राम
- लूम्भा
- बाघा
- बींजा
- शिवराज (सुरताण)
- राव जोधाजी - जोधपुर के संस्थापक।
- अखैराज- इनके पौत्र कूम्पा से कुंपावत राठौड़ हुए !
- कांधल - इनके वंशज कांधलोत राठौड़ हुए ! वह अपने भतीजे राव बीकाजी के साथ मिलकर जांगलदेश पर विजय प्राप्त की और बीकानेर की स्थापना की; इनके वंशज के बीकानेर राज्य में रावतसर, चूरू, भादरा सहित कई ठिकाने हैं। हिसार में सुल्तान सारंग खान के साथ युद्ध में लगे घावों के साहवा में उनकी मृत्यु हो गई।
- चाम्पा - इनके वंशज चांपावत राठौड़ हुए ! पिलवा , कापरड़ा, रणसीगांव, बालोतरा, दासपां, पोखरण, आउवा, पालड़ी, रोहट , सिंगारी, ढांडियां, बाजेंका -ढिंगसारा , धामली , हुर्सोला, सुतलाना, जौला और कटोह के ठाकुर आदि चम्पावत राठौड़ इनके वंशज हैं।
- भाकरसी- इनके वंशज भाखरोत राठौड़ हुए !
- अड़ावल - इनके वंशज आड़ावल राठौड़ हुए !
- मंडला - इनके वंशज मंडलावत राठौड़ हुए !
- मांडण - इनके वंशज मांडणोत राठौड़ हुए !
- वेरा - इनके वंशज बेरावत राठौड़ हुए !
- लाखा - इनके वंशज लखावत राठौड़ हुए !
- भोजराज-इनके वंशज भोजराजोत राठौड़ हुए !
- पाता - इनके वंशज पातावत राठौड़ हुए !
- रूपा - इनके वंशज रूपवत राठौड़ हुए !
- डूंगर - इनके वंशज डुंगरोत राठौड़ हुए !
- उदा - इनके वंशज उदावत राठौड़ हुए !
- गोयंद
- कर्मचंद
- सांडा - इनके वंशज सांडावत राठौड़ हुए !
- हापो
- करण - इनके वंशज करणोत राठौड़ हुए !
- नाथूजी - इनके वंशज नाथुओत राठौड़ हुए !
- जेतमाल- इनके वंशज जैतावत राठौड़ हुए !
- सावर
- सगता
- नींबा - अल्पायु में मृत्यु
- बीका - बीकानेर का स्वतन्त्र राज्य कायम किया। इनके वंशज बीका राठौड़ हुए।
- सातल - जोधाजी के उत्तराधिकरी, जोधपुर के राजा हुए।
- सूजा - सातल के उत्तराधिकरी जोधपुर के राजा हुए।
- कर्मसी - इसके वंशज करमसोत जोधा हुए (ठिकाना खींवसर)।
- रायपाल - इसके वंशज रायपालोत हुए।
- वणवीर - इनके वंशज बणवीरोत जोधा हुए।
- जसवन्त - इनके वंशज जसूत जोधा हुए।
- कूंपा
- चांदराव,
- बीदा - इसके वंशज बीदावत हुए, इनके बीकानेर राज्य में बीदासर, गोपालपुरा सहित कई प्रमुख ठिकाने थे।
- जोगा - इसके पुत्र खंगार के खंगारोत जोधा हुए। खारियो, पुनास, जालसू, डाहोली, खारी, छापली अदि इनके गांव हैं।
- भारमल - इसके वंशज भारमलोत जोधा हुए।
- दूदा - इसके वंशज मेड़ता में रहने से मेड़तिया कहलाए, प्रसिद्द भक्त मीराबाई दूदाजी के पुत्र रतनसिंह की पुत्री थी व मेवाड़ के महाराणा सांगा की पुत्रवधू थी। दूसरे पुत्र विक्रमदेव के वंशजों के घाणेराव, मसूदा, बालुन्दा व मेवाड़ में बदनौर ठिकाने थे।
- वरसिंह - इसके वंशज वरसिंहोत जोधा हुए। इनके पुत्र सिंहाजी के वंशजो ने मध्यप्रदेश में झाबुआ व आसकरण के वंशजों ने राजस्थान में कुशलगढ़ स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।
- सामन्तसिंह,
- शिवराज - इनके वंशज शिवराजोत जोधा हुए !
- बाघा - इनके पुत्र गांगा जी सन् 1515 ई. में मारवाड़ के शासक बने।
- नरा - नराजी राठौड़ फलौदी के शासक थे। तंवरों ने अपनी लड़की नराजी के पुत्र वीरमजी को विवाह कर पोखरण का कुछ भाग दहेज में देकर चुकाया। वहीं से वीरमजी के वंशज पोखरिया राठौड़ कहलाये। पोखरिया राठौड़ों के मुख्य ठिकाने काणेचा, राजियावास, नरवर, सवाईपुरा आदि है। पोखरिया के वंश परम्परा में खींवाजी राठौड़ के वंश में भरल राठौड़ और मामणियात राठौड़ हुए। भरल राठौड़ो के मुख्य ठिकाने राजोसी, रामखेड़ा, धनार, राया, बूंटीवास, फतहपुरिया, लूलवा, बोरवा, धोलिया, सूरजपुरा आदि है।
- शेखा,
- देवीदास,
- राव ऊदा,
- प्राग,
- सांगा - सांगावत जोधा।
- पृथुराव और
- नापा -
- मालदेव - जोधपुर के राव हुए।
- भैरसाल
- मानसिंह
- किशन दास - वंशज किशनावत जोधा, नानादवान के ठाकुर।
- सादुल [शार्दुल]
- कान्हा
- रामराय - सबसे बड़ा पुत्र, लेकिन मालदेव ने उसे उत्तराधिकारी नहीं बनाया। इसका पौत्र जगन्नाथ अमझेरा का शासक हुआ। इसके वंशज रामोत जोधा का मारवाड़ में भी पावा ठिकाना था। इसके पुत्र केशोदास के वंशज केशोदासोत जोधा हुए।
- उदयसिंह - इसे मालदेव ने फलोदी की जागीर दी। चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद बादशाह ने जोधपुर का राज्य इसे दे दिया।
- चंद्रसेन - अपने पिता मालदेव का उत्तराधिकारी हुआ।
- रायमल - इसके वंशजों से अभेराजोत जोधा (ठिकाना निंबी), केसरीसिंहोत जोधा के ठिकाना लाडनूं, सिंगरावट, लेहड़ी, गौराऊ, व कई छोटे ठिकाने थे। इन्ही क वंशज बिहारीदासोत जोधा के रोहिसी तथा मुडियासरी गांव थे।
- आसकरण - (जूनिया ठिकाना के पूर्वज)
- गोपालदास
- पृथ्वीराज - जालोर परिवार के पूर्वज पृथ्वीराज
- रतनसिंह - रतनसिंहोत जोधा, ठिकाना भाद्रजुन
- भोजराज - भगासणी गांव भोजराजोत जोधा का था
- बिक्रमजीत
- भानसिंह - इनके वंशज भानोत जोधा हुए।
- दोनों ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की।
- दोनों ने छापामार युद्ध प्रणाली का अनुसरण किया। भाई दोनों को अपने भाइयों के विरोध का सामना करना पड़ा। जैसे जगमाल ने प्रताप का विरोध किया वैसे ही राम व उदयसिंह ने चंद्रसेन का विरोध किया।
- दोनों के अधिकतर राज्य पर अकबर ने अधिकार कर लिया तथा केवल थोड़ी सी भूमि के बल पर अकबर का सामना किया।
- दोनों को अपने राज्य के बाहर शरण लेनी पड़ी। जैसे प्रताप ने छप्पन के मैदान (बांसवाड़ा) में शरण ली और चंद्रसेन ने डूंगरपुर के राजा आसकरण के पास शरण ली। इनके पुत्र हुए ...
- रायसिंह
- उग्रसेन - उग्रसेन के पुत्र करमसेन के कर्मसेनोत जोधा हुए, ठिकाना भिनाय, बांदनवाड़ा, टांटोटी के आलावा अजमेर में ही देवगांव बघेरा, करोट, जेतपुरा, जड़ना, काचरिया हैं।
- आसकरण
- कुंवर नरहरदास - नरहरदासोत, ठिकाना- नादणी, नरवर, भदूण। पुत्र जगन्नाथ के जगन्नाथोत जोधा, ठिकाना- मोरेरा।
- राजकुमार भगवान दास - इनके पुत्र गोयन्ददास के गोयन्ददासोत जोधा हुए, ठिकाने खेरवा, बाबरा, बलाड़ा। दूसरे पुत्र गोपालदास के गोपालदासोत हुए, ठिकाने- तोलासर, मालावासणी, खेतोलाई।
- राजकुमार भूपत सिंह - उन्होंने अपने भाई, किशन सिंह के साथ जोधपुर छोड़ दिया, और उन्हें पांच गांवों की एक जागीर दी गई। किशनगढ़ में नरैना , पंडरवारा, भादून और खेरियन भूपतौत के ठिकाने थे।
- राजकुमार अखैराज सिंह
- राजकुमार दलपतसिंह - दलपत का बेटा महेशदास मुगल बादशाह शाहजहाँ का मनसबदार था। शाहजहाँ द्वारा महेशदास को सन् 1642 ई0 में जालौर का परगना जागीर के रूप में दिया गया था। महेशदास का उत्तराधिकारी रतनसिंह हुआ। जालौर परगने की आय कम होने के कारण शाहजहाँ ने रतनसिंह को सन् 1656 ई0 में जालौर के स्थान पर मालवा में परगना जागीर के रूप में दिया। रतनसिंह ने रतलाम (मध्यप्रदेश) बसाकर मालवा में एक नए राठोड राज्य की स्थापना की। ०रंगजेब द्वारा रतलाम वापस ले लेने पर रतनसिंह के पौत्र केशोदास ने सीतामऊ राज्य कीस्थापना की।
- राजकुमार सकत सिंह - सकतसिंहोत जोधा, ठिकाने- रघुनाथपुरा और नालू (किशनगढ़ में) और जोधपुर में खरवा ।
- सवाई राजा सूरसिंह जी {जोधपुर के राजा हुए)
- राजकुमार जेतसिंह - जेतसिंहोत जोधा, ठिकाने- जैतगढ़ मेवड़िया (अजमेर), खेरवा, नोखा, कनमोर, मोरण। पौत्र रतनसिंह से रतनोत, ठिकाना दुगोली, लोहोती अदि। ।
- कुंवर पुरण मल
- कुंवर माधो दास - माधोदासोत जोधा, ठिकाने- पीसांगन, महरू, जून्या, पारा, गोविंदगढ़।
- कुंवर मोहन दास - गांव रामपुरिया (मेड़ता में ) हैं।
- कुंवर कीरत सिंह
- कुंवर किशनसिंह
- कुंवर केशोदास [केसरी सिंह] - ठिकाना पीसांगन ।
- कुंवर जसवंत सिंह मानपुरा परिवार के पूर्वज
- कुंवर राम दास
- महाराजा गज सिंहजी प्रथम
- राजकुमार सबल सिंह
- राजकुमार वीरम देव
- राजकुमार बिजय सिंह
- राजकुमार प्रताप सिंह
- राजकुमार जसवंत सिंह
- राजकुमार पृथ्वी सिंह
- राजकुमार जगत सिंह
- राजकुमार दलथंबनसिंह
- महाराजा अजीत सिंह
- महाराजा अभय सिंह
- महाराजा राय सिंह द्वितीय
- महाराजा बख्त सिंह
- राजा आनंद सिंह , (ईडर के राजा)
- राजकुमार रसा सिंह (झाबुआ में गोद गए)
- भोम सिंह (इनका पुत्र भीम सिंह राजा हुआ )
- गुमान सिंह (इनका पुत्र मान सिंह भी बाद में राजा हुआ)
- फतेह सिंह , (युवा की मृत्यु हो गई)
- जालिम सिंह (उन्होंने उदयपुर (मेवाड़) में आत्महत्या कर ली)
- सावंत सिंह
- शेर सिंह
- सरदार सिंह
- महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय
- जोरावरसिंहजी (रावटी की जागीर प्रदान की गई)
- सर प्रताप सिंहजी (ईडर के महाराजा)
- रणजीत सिंह
- भोपाल सिंह
- किशोर सिंह
- माधो सिंह
- बहादुर सिंह
- महाबत सिंह
- जालिम सिंह
बीकानेर राज्य
बीकानेर राज्य
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- राव नरोजी – बीकानेर के राजा बने !
- राव लुनकरणजी – बीकानेर के राजा बने !
- कुंवर घड़सी :- इनके वंशज घड़सियोत बीका हुए (ठिकाना घड़सीसर, गारबदेसर ) !
- कुंवर अमर सिंह :- इनके वंशज अमरावत बीका हुए !
- कुंवर राज सिंह :- इनके वंशज राजसिंगोत बीका हुए !
- कुंवर मेघराज
- कुंवर केलण
- कुंवर देवसी
- कुंवर विजयसिंह
- कुंवर बीसा :- इनके वंशज बिसावत बीका हुए !
राव नराजी
बीकानेर के दूसरे राजा : 1504-1505 :– राव बीका के मृत्यु के बाद उसका पुत्र नरा बीकानेर का शासक बना, लेकिन उसकी कुछ महिनों बाद ही मृत्यु हो गई।राव लूणकर्ण
बीकानेर के तीसरे राजा (1505-1526) :– राव नरा की मृत्यु के बाद बीकाजी का दूसरा पुत्र लूणकरण बीकानेर का शासक बना। जिसने डीडवाणा, सिघांणा व बांगड़ प्रदेश को अपने प्रदेश में मिला लिया। उसने 1509 में ददरेवा के स्वामी मानसिंह चौहान को हराकर ददरेवा पर कब्ज़ा किया। 1512 में उसने फतेहपुर पर आक्रमण किया और 120 गांवों पर कब्जा कर लिया। चायलवाड़ा (साहवा से हिसार व् सिरसा के मध्य) के मालिक पूना चायल को हराकर 400 गांवों पर कब्ज़ा किया। 1513 में नागौर के स्वामी मुहम्मद खान ने बीकानेर पर हमला किया लेकिन लूणकरण ने उसे पराजित कर दिया। सन 1526 में नारनौल के नवाब के साथ युद्ध में धौंसा नामक स्थान पर राव लूणकरण मारा गया। यह भी अपने पिता की तरह वीर और प्रजापालक था। वैसे बीकानेर का कर्ण के नाम से भी जाना जाता है, बीठू सुजा ने अपने ग्रन्थ राव जेतसी रो छन्द में लुणकरण की दानशीलता का उल्लेख किया है। इसके 12 पुत्र हुए (नैणसी की ख्यात में 10 पुत्रों का उल्लेख है) …- राव जैतसी – बीकानेर के राजा बने !
- कुंवर रतन सिंह :- इनके वंशज रतनसिंगोत बीका हुए (ठिकाना महाजन, कुंभाणा) !
- कुंवर प्रताप सिंह :- इनके वंशज प्रतापसिंगोत बीका हुए !
- कुंवर बैरसी :- इनके पुत्र नारण के वंशज नारणोत बीका हुए (ठिकाना मगरासर, मेनसर, तेहनदेसर, कातर)!
- कुंवर तेजसी :- इनके वंशज तेजसिंहोत बीका हुए !
- कुंवर नेतसी
- कुंवर करमसी
- कुंवर किशनसी
- कुंवर रामसिंह
- कुंवर सूरजमल
- कुंवर कुशलसिंह
- कुंवर रूपसी
राव जैतसी
बीकानेर के चौथे राजा (1526- 1542) :- लुणकरण की मृत्यु के बाद उसका पुत्र राव जैतसिह बीकानेर का शासक बना। जिसने गंगाणी के युद्ध में जोधपुर के शासक राव गागा की मदद की। सन 1534 में बाबर के पुत्र कामरान ने भटनेर (जोकि कांधल के पौत्र खेतसी के अधिकार में था) पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया व फिर सेना लेकर बीकानेर पर चढ़ आया। जेतसी एक बार तो गढ़ छोड़कर हट गया, लेकिन फिर सेना एकत्र कर वापिस हमला किया व रातीघाटी के युद्ध में मुगल सेना को मार भगाया। जोधपुर के शासक राव मालदेव ने 1541 में अपनी विस्तारवादी व महत्वकांक्षी नीति के तहत बीकानेर पर आक्रमण कर दिया। राव जैतसी पाहिबा/सौहुए के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ व बीकानेर पर मालदेव का अधिकार हो गया। यह पहला अवसर था जब दोनों रियासतों के मध्य युद्ध हुआ। इससे पहले ये सामुहिक रूप से प्रतिकार करते थे। जैतसी के तेरह पुत्र हुए ….- राव कल्याणमल :- बीकानेर के राजा बने !
- राजकुमार भीमराज :- इनके वंशज भीमराजोत बीका हुए (ठिकाना राजपुरा) !
- राजकुमार ठाकुरसी :- इनके पुत्र बाघसिंह के वंशज बाघावत बीका हुए (ठिकाना मेघाणा) !
- राजकुमार मालदेव
- राजकुमार कान्ह
- राजकुमार श्रृंग :- इनके वंशज श्रिंगोत (सिणगोत) बीका हुए (ठिकाने भुकरका, जसाणा, सिधमुख, बांय, अजितपुरा, बिरकाली, शिमला, रसलाणा, थिराणा, रणसीसर, जबरासर, कानसर) !
- राजकुमार सुरजन
- राजकुमार करमसेन
- राजकुमार पूरनमल
- राजकुमार अचलदास
- राजकुमार मान सिंह :- इनके वंशज मानसिंहोत बीका हुए !
- राजकुमार भोजराज
- राजकुमार तिलोकसी
राव कल्याणमल
बीकानेर के पांचवे राजा (1542-1574)- पाहिबा के युद्ध में जैतसी वीरगति को प्राप्त हुआ अतः उसका पुत्र कल्याणमल शेरशाह सूरी के पास चला गया। अधिकांश बीकानेर पर मालदेव का अधिकार होने के कारण कल्याणमल का राज्याभिषेक ठकुरियासर में हुआ । सिरसा में रहते हुए ही उसने अपने पैतृक राज्य को प्राप्त करने का प्रयास किया । शेरशाह सूरी व जोधपुर के राजा मालदेव के मध्य 5 जनवरी 1544 ई. को गिरी सुमेल का युद्ध हुआ । राम कल्याणमल ने गिरी सुमेल के युद्ध में शेरशाह की सहायता की थी। गीर्री-सुमेल के मैदान में मालदेव पराजित हो गया। 1544 ई. में शेरशाह सूरी ने बीकानेर राज्य कल्याणमल को दे दिया। 1570 ई. में जब अकबर ने नागौर दरबार का आयोजन किया तो बीकानेर शासक राव कल्याणमल अपने पुत्र रायसिंह व पृथ्वीराज के साथ नागौर दरबार में उपस्थित हुआ। अकबर ने कल्याण सिंह के बडे पुत्र रायसिंह को जोधपुर का प्रशासक नियुक्त कर दिया व छोटे पुत्र पृथ्वीराज को मुगल दरबार में ले गया। राव कल्याणमल बीकानेर राज्य तथा मुगलों के बीच प्रथम संधि पर हस्ताक्षर करने वाले प्रथम शासक थे। राव कल्याणमल को दो हजार का मनसब दिया गया । 24 जनवरी 1574 को राव कल्याणमल का देहांत हो गया। इन के 10 पुत्र थे …- राजा रायसिंह :- बीकानेर के राजा बने !
- राजकुमार अमर सिंह :- इनके वंशज अमरसिंहोत बीका हुए ( ठिकाना हरदेसर) !
- राजकुमार सुरतान
- राजकुमार पृथ्वीराज :- कवि पीथळ के नाम से प्रसिद्ध हुए। अकबर के दरबार में नवरत्नों में थे। अकबर ने इन्हे गागरोन का किला दिया था। इनके वंशज पृथ्वीराजोत बीका हुए (ठिकाना ददरेवा)!
- राजकुमार राम सिंह
- राजकुमार भाण
- राजकुमार सारंगदेव
- राजकुमार भाखरसी
- राजकुमार भोपालसी
- राजकुमार राघवदास
राजा रायसिह
बीकानेर के छठे राजा (1574-1612)- यह अकबर व जहांगीर के विश्वसनीय सेनानायक बने। राजा बनने से पहले ही इनकी योग्यता को देखते हुए 1572 ई. में अकबर ने इन्हे जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया। वहा उनका तीन वर्ष तक अधिकार रहा। 1574 में रायसिह बीकानेर के शासक बने। अकबर ने इन्हे राजा की उपाधि प्रदान दी (इनसे पहले के शासको की उपाधि राव थी)। उन्होने मुगल सेना की मदद से सोजत और सिरियारी में जोधपुर के राजा को हराया। उन्होंने अलग-अलग मौकों पर गुजरात, बंगाल और काबुल के अभियानों में मुगल सेना का नेतृत्व किया। 1577 ई. में अकबर ने इकावन (51) परगने रायसिंह को दिये। खुसरों के विद्रोह के समय जहांगीर ने रायसिंह को अपना विश्वस्त मानकर राजधानी आगरा की जिम्मेदारी सौंपी। उनकी मनसबदारी को 4000 से बढ़ाकर 5000 किया गया। उन्हें 1585 में बुरहानपुर का सूबेदार, 1596 में सूरत का राज्यपाल और 1612 में बुरहानपुर का राज्यपाल नियुक्त किया गया। अकबर और जहांगीर का विश्वासपात्र होने के कारण विशेष अवसरों पर रायसिंह की नियुक्ति हुआ करती थी और समय-समय पर उसे बादशाह की ओर से जागीरें भी मिलती रहीं। 1567 से पहले ही जूनागढ़ और सोरठ के ज़िले रायसिंह को जागीर में मिल गये थे। पाउलेट ने ‘गैजेटियर ऑव दि बीकानेर स्टेट’ में अकबर के 43 वे राज्यवर्ष ( ई० स० 1566) के उस फ़रमान का उल्लेख किया है, जिसमें रायसिंह को चार करोड़ दाम (करीब 10 लाख रूपये) आय के निम्नलिखित परगने मिलना लिखा है’– बीकानेर 32,50,000 दाम बाटलोद 6,40.000 दाम बारथल (सूबा हिसार में) 9,80,032 दाम सिदमुख (सूबा हिसार में) 72,152 दाम द्रोणपुर (सूबा अजमेर) 7,81,386 दाम भटनेर (सरकार हिसार में) 6,32,742 दाम मारोठ (सरकार मुल्तान में) 2,80,000 दाम सरकार सूरत (सोरठ) में जूनागढ़ तथा अन्य 47 परगने 3,32,66,662 दाम कुलजोड़ 4,02,06,274 दाम (अर्थात् अनुमान 10,05,157 रुपये)। वि०सं० १६५७ (सन 1600) में सरकार नागोर आदि के परगने भी उसकी जागीर में शामिल कर दिये गये । वि० सं० १६६१ ( ई० स० 1604) में परगना शम्साबाद के दो भाग कर दोनों ही रायसिंह को दे दिये गये। 1589 में अपने मंत्री कर्मचंद की देखरेख में बीकानेर के वर्तमान दुर्ग जूनागढ़ का निर्माण करवाया तथा दुर्ग में एक प्रशस्ति लगाई। रायसिह विद्यानुरागी व धार्मिक प्रवृत्ति का था। जिसने ‘राय सिंह महोत्सव’ व ज्योतिष रत्नमाला जैसे ग्रंथों की रचना की। कवि जयसोम रचित “कर्मचन्द वंशौत्कीर्तिम् काव्यम्” में महाराजा रायसिंह को राजेन्द्र कहा गया है। इनकी दानशीलता के कारण मुंशीदेवी प्रसाद ने इन्हे राजपूतानें के करण की संज्ञा दी। 1612 में दक्षिण भारत के बुरहानपुर में इनकी मृत्यु हो गई। राजकुमार पृथ्वीराज- साहित्यक जगत में पीथळ के नाम से प्रसिद्ध पृथ्वीराज बीकानेर के राजा रायसिंह के छोटे भाई थे| जिनका जन्म 1549 को हुआ था।| वे बड़े वीर, विष्णु के परम भक्त और उंचे दर्जे के कवि थे। संस्कृत और डिंगल साहित्य के वे विद्वान थे। राजस्थानी भाषा के साहित्य जगत में पृथ्वीराज की विष्णु-भक्ति की कई कथाएं प्रसिद्ध हैं। “वेलि क्रिसन रुकमणी री” पृथ्वीराज की सर्वोत्कृष्ट रचना मानी जाती है। इस ग्रन्थरत्न का निर्माण ई.सं. 1580 में हुआ था। इसके अतिरिक्त उसके राम-कृष्ण सम्बन्धी तथा अन्य फुटकर गीत एवं छन्द भी उपलब्ध हैं, जो अपने ढंग के अनोखे हैं। इतिहासकार कर्नल टॉड पृथ्वीराज के बारे में लिखते है- “पृथ्वीराज अपने युग के सर्वाधिक पराक्रमी प्रमुखों में से एक था तथा वह पश्चिम के प्राचीन ट्रोबेडूर राजाओं की भाँती युद्ध-कला के साथ ही कवित्व-कला में भी निपुण था| चारणों की सभा में इस राजपूत अश्वारोही योद्धा को एक मत से प्रशंसा का ताल-पत्र दिया गया था| प्रताप के नाम से उसके मन में अगाध श्रद्धा थी|” (कर्नल टॉड कृत राजस्थान का पुरातत्व एवं इतिहास, पृष्ठ 359.) इतिहासकार डा. गोपीनाथ शर्मा, अपनी पुस्तक “राजस्थान का इतिहास” के पृष्ठ-322,23. पर लिखते है-“पृथ्वीराज, जो बड़ा वीर, विष्णु का परमभक्त और उच्चकोटि का कवि था, अकबर के दरबारियों में सम्मानित राजकुमार था| मुह्नोत नैणसी की ख्यात में पाया जाता है कि बादशाह ने उसे गागरौन का किला जागीर में दिया था| वह मिर्जा हकीम के साथ 1581 ई. की काबुल की और 1596 ई. की अहमदनगर की लड़ाई में शाही सेना में सम्मिलित था|” अकबर के समय के लिखे हुए इतिहास ‘अकबरनामे’ में भी उनका नाम दो-तीन स्थानों पर आया है। अकबर के दरबार में रहते हुए भी पृथ्वीराज अकबर के सबसे बड़े शत्रु महाराणा प्रताप के परमभक्त थे| एक दिन अकबर ने उन्हें बताया कि महाराणा प्रताप उसकी अधीनता स्वीकार करने को राजी हो गये है, तब उन्होंने अकबर से कहा कि यह नहीं हो सकता, यह खबर झूंठ है, यदि आज्ञा हो तो मैं पत्र लिखकर सच्चाई का पता कर लूँ| और इस तरह उन्होंने बादशाह की अनुमति लेकर उसी समय निम्नलिखित दो दोहे बनाकर महाराणा के पास भेजे— पातल जो पतसाह, बोलै मुख हूंतां बयण । मिहर पछम दिस मांह, ऊगे कासप राव उत॥1 ॥ पटकूं मूंछां पाण, के पटकूं निज तन करद। दीजे लिख दीवाण, इण दो महली बात इक’॥2 ॥ इन दोहों का उत्तर महाराणा ने इस प्रकार दिया— तुर्क कहासी मुखपती, इणू तन सूं इकलिंग। ऊगै जांही ऊगसी, प्राची बीच पतंग॥1 ॥ खुसी हूंत पीथल कमध, पटको मूंछां पाण। पछटण है जेतै पतौ, कलमाँ सिर केवाण ॥2 ॥ सांग मूंड सहसी सको, समजस जहर सवाद। भड़ पीथल जीतो भलां बैण तुरक सुं वाद ॥3 ॥ पृथ्वीराज ने 1600 ई. में मथुरा के विश्रान्त घाट पर प्राण-त्याग किया। पृथ्वीराज की मृत्यु पर बादशाह अकबर ने उनके वियोग में निम्न दोहा कहा- पीथल सूं मजलिस गई, तानसेन सौ राग। रीझ बोल हंस खेलबौ, गयौ बीरबळ साथ।। पृथ्वीराज के वंश के पृथ्वीराजोत बीका कहलाते हैं, जो दद्रेवा ठिकाने के पट्टेदार हैं और दोलड़ी ताज़ीम का सम्मान प्राप्त हैं। राजा रायसिंह के पांच पुत्र हुए (नोट- नेणसी ने 4 पुत्रों के ही नाम दिए हैं, हनवंत सिंह का नाम नहीं है) ….- राजा दलपतसिंह :- बीकानेर के राजा बने !
- राजा सूरसिंह :- बीकानेर के राजा बने !
- राजकुमार भूपसिंह
- राजकुमार हनवंत सिंह
- राजकुमार किशन सिंह :- इनके वंशज किशनसिंहोत बीका हुए ( ठिकाना सांखू, नीमा, रावतसर कुंजला) !
राजा सूरसिंह
बीकानेर के 8वें राजा (1614 -1631) - उन्हें अपने भाई दलपत के स्थान पर जहांगीर के सहयोग से बीकानेर की गद्दी मिली। इन्होने अपने पिता रायसिंह को अंतिम समय में दिए वचन की पलना में, उनके साथ षड्यंत्र करने वालों (दीवान कर्मचंद, पुरोहित मान महेश, बारहठ चौथ व भरथा सारण) से बदला लिया। इन के शासनकाल के अंत तक बीकानेर राज आकार में बहुत कम हो गया था। उन्होंने भी दिल्ली के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखा और विभिन्न सैन्य अभियानों में शाही सेना का नेतृत्व किया। इनके तीन पुत्र हुए ….- राजा कर्ण सिंह
- राजकुमार शत्रुसालजी
- राजकुमार अर्जुनसिंह
राजा कर्णसिंह
बीकानेर के 9वें राजा (1631-1669)- बीकानेर के राठौड़ राजाओं में महाराजा करण सिंह का स्थान बड़ा महत्त्वपूर्ण है। बादशाह शाहजहाँ के दरबार में करणसिंह का सम्मान ऊँचा था। उनके पास दो हजार जात व डेढ़ हजार सवार का मनसब था। कट्टर और धर्मांध मुग़ल शासक औरंगजेब से बीकानेर के राजाओं में सबसे पहले उनका ही सम्पर्क हुआ था। औरंगजेब के साथ उन्होंने कई युद्ध अभियानों में भाग लिया था अत: जहाँ वे औरंगजेब की शक्ति, चतुरता से वाकिफ थे। वहीं औरंगजेब की कुटिल मनोवृति, कुटिल चालें, कट्टर धर्मान्धता उनसे छुपी नहीं थी। यही कारण था कि औरंगजेब ने जब पिता से विद्रोह किया तब वे बीकानेर लौट आये और दिल्ली की गद्दी के लिए हुए मुग़ल भाइयों की लड़ाई में तटस्थ बने रहे। औरंगजेब के साथ कई युद्ध अभियानों में भाग लिया पर वे सदैव उसकी तरफ से सतर्क रहते थे। उन्होंने सभी हिन्दू राजाओं को औरंगजेब का जबरन मुसलमान बनाने का षड्यंत्र विफल कर दिया। औरंगजेब की उक्त मंशा असफल होने पर वह महाराजा करण सिंह पर काफी क्रुद्ध हुआ। जंगलधर बादशाह की पदवी : राजस्थान के मूर्धन्य इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार “ ऐसी प्रसिद्धि है कि एक समय बहुत से राजाओं को साथ लेकर बादशाह ने ईरान (?) की और प्रस्थान किया और मार्ग में अटक में डेरे हुए. औरंगजेब की इस चाल में कयास भेद था, यह उसके साथ जाने वाले राजपूत राजाओं को मालूम न होने से उनके मन में नाना प्रकार के सन्देह होने लगे, अतएव आपस में सलाह कर उन्होंने साहबे के सैय्यद फ़क़ीर को, जो करण सिंह के साथ था, बादशाह के असली मनसूबे का पता लगाने भेजा. उस फ़क़ीर को अस्तखां से जब मालूम हुआ कि बादशाह सब को एक दीन करना चाहते है, तो उसने तुरंत इसकी खबर करण सिंह को दी. तब सब राजाओं ने मिलकर यह राय स्थिर की कि मुसलमानों को पहले अटक के पार उतर जाने दिया जाय, फिर स्वयं अपने अपने देश को लौट जायें. बाद में ऐसा ही हुआ. मुसलमान पहले उतर गये. इसी समय तब सब के सब करण सिंह के पास गए और उन्होंने उससे कहा कि आपके बिना हमारा उद्धार नहीं हो सकता. आप यदि नावें तुड़वा दें तो हमारा बचाव हो सकता है, क्योंकि ऐसा होने से देश को प्रस्थान करते समय शाही सेना हमारा पीछा न कर सकेगी. करणसिंह ने भी प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ऐसा ही किया गया और इसके बदले में समस्त राजाओं ने करणसिंह को “जंगलधर बादशाह” का ख़िताब दिया. जैसा की इतिहासकार गौरीशंकर ओझा ने लिखा है कि औरंगजेब के षड्यंत्र विफल करने के लिए राजाओं का नेतृत्व करने के बदले राजाओं ने उन्हें जंगलधर बादशाह का ख़िताब दिया. अंतिम समय : हिन्दू राजाओं को मुसलमान बनाने का षड्यंत्र विफल कर देने पर औरंगजेब ने नाराज होकर दिल्ली लौटने पर उनके ऊपर सेना भेजी। उनके पुत्र को राजा की पदवी व मनसब आदि दिए गए व उन्हें बुलाकर मरवाने का षड्यंत्र द्वारा रचा गया। इसी षड्यंत्र के तहत उन्हें एक दूत के माध्यम से सूचना देकर दरबार में बुलवाया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार भी कर लिया। पर औरंगजेब की कुटिल चालों को समझने वाले महाराजा करण सिंह अपने दो वीर पुत्रों केसरी सिंह तथा पद्म सिंह को साथ ले दिल्ली दरबार में पहुंचे, जिसकी वजह से औरंग द्वारा उन्हें मरवाने के प्रबंध विफल हो गए। तब बादशाह ने उन्हें औरंगाबाद में भेज दिया, जहाँ वे अपने नाम से बसाए कर्णपुरा में रहने लगे। विद्यानुराग : महाराजा करण सिंह स्वयं विद्वान व विद्यानुरागी होने के साथ विद्वानों के आश्रयदाता थे। उनकी सहायता से कई विद्वानों ने मिलकर “साहित्यकल्पद्रुम” नामक ग्रन्थ रचा, पंडित गंगानंद मैथिल ने “कर्णभूषण”, “काव्य डाकिनी”, भट्ट होसिक कृत “कर्णवंतस”, कवि मुद्रल कृत “कर्णसंतोष” व “वृतासवली” नामक ग्रन्थों की रचना हुई जो आज भी बीकानेर के राजकीय पुस्तकालय में विद्यमान है। औरंगाबाद पहुँचने के लगभग एक वर्ष बाद महाराजा करण सिंह निधन हो गया। करणसिंह की स्मारक छतरी के लेख के अनुसार वि.स. 1726 आषाढ़ सुदि 4 मंगलवार (22 जून 1669) को उनका निधन हुआ था। नेणसी ने महाराजा करण सिंह के 10 पुत्रों के नाम दिए हैं,-- महाराजा अनूप सिंह
- कुंवर केसरी सिह
- कुंवर पद्म सिंह,
- कुंवर मोहनसिंह,
- कुंवर देवीसिंह,
- कुंवर मदन सिंह,
- कुंवर अमरसिंह.
- कुंवर अजबसिंह
- उदयसिंह
- मालीदास
- महाराजा सरूप सिंह
- महाराजा सुजान सिंह
- कुंवर रूपसिंह
- कुंवर रुद्रसिंह
- कुंवर आनंद सिंह (नेणसी ने एक गजसिंह भी नाम दिया है)
- महाराजा जोरावर सिंह
- कुमार अभय सिंह
- महाराजा राज सिंह
- महाराजा सूरत सिंह
- कुमार छत्तर सिंह
- कुमार अजब सिंह
- कुमार सुल्तान सिंह
- कुमार श्याम सिंह
- कुमार देवी सिंह
- कुमार खुमाण सिंह
- कुमार मोहकम सिंह
- कुमार राम सिंह
- कुमार गुमान सिंह
- कुमार सबल सिंह
- कुमार भोपाल सिंह
- कुमार जगत सिंह
- कुमार मोहन सिंह
- कुमार उदय सिंह
- कुमार जालिम सिंह
- कुमार खुशाल सिंह
- महाराजा प्रताप सिंह
- कुमार जय सिंह
- महाराजा रतनसिंह
- कुंवर मोतीसिंह
- कुंवर लखमीसिंह
- कुंवर टीकमसिंह
- महाराजा सरदारसिंह
- कुंवर शेरसिंह
- कुंवर राम सिंहजी
- महाराजा श्री सादुल सिंह जी
- कुंवर बिजय सिंहजी
- कुंवर वीर सिंहजी


बीको -नरो -लूणकरण, जैतो – कल्लो -राय !दलपत-सूरो-कर्णसिंघ, अनूप-सरुप-सुजान !जोरो – गज्जो – राजसिंघ , परतापो -सूरत !रतनसिंघ-सरदारसिंघ, डूंगर-गंग महिपत !
भारत में राठौड़ों के राज्य
रियासतों के भारत संघ में विलीनीकरण से पूर्व सम्पूर्ण भारत मे राठौड़ों के राज्य ..
- राजपुताना – जोधपुर, बीकानेर, कुशलगढ़, किशनगढ़ .
- मालवा- रतलाम, सैलाना, अलीराजपुर, ईडर, झाबुआ, जोबेट, काछी बड़ोदा, मुलथान, व अमझेरा.
- संयुक्त प्रान्त (उ प्र) – रायपुर (एटा), खिमशेपुर, विजयपुर, मांडा ढहिया.
- बिहार – खरसवां, सिंगभूमि .
- उड़ीसा – बोनई, रेसखोल.
- हिमाचल – जुब्बल, चम्बा.
- हरियाणा – जहाजगढ़.
- गुजरात - विजयनगर
- बुंदेला शाखा के राज्य- ओरछा, पन्ना, दतिया, चरावरी, अजयगढ !
मारवाड़ (जोधपुर) : (विस्तृत विवरण अलग से दिया गया है)
बीकानेर (राजपूताना) : राव जोधा के पुत्र राजकुमार बीका ने, पिता के आदेश से नवीन बीकानेर राज्य की स्थापना की। (विस्तृत विवरण अलग से दिया गया है)
मेड़ता (राजपूताना) : राव जोधा ने अपने पुत्रों वरसिंह तथा दूदा को मेड़ता की जागीर दी, किंतु बाद में वरसिंह ने दूदा को रायण भेज दिया। दूदा कुछ दिन रायण में रहा किंतु वहाँ से अपने बड़े भाई बीका के पास बीकानेर चला गया। जोधा के पुत्र सूजा के राज्य समय में वरसिंह की मृत्यु हो गई तथा वरसिंह का पुत्र सीहा मेड़ता का स्वामी हुआ। सीहा अयोग्य था तथा मदिरा के नशे में धुत्त में रहता था। इसलिये राव दूदा ने बीकानेर से मेड़ता आकर सीहा को हटा दिया और स्वयं मेड़ता का स्वतंत्र शासक बन गया। राव मालदेव के समय में मेड़ता राज्य, जोधपुर राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।
कुशलगढ़ (राजपूताना) : जोधा के पुत्र वरसिंह जिसे जोधा ने मेड़ता की जागीर पर नियुक्त किया था, उसके पौत्र रामसिंह के पुत्र अखैराज को 1671 में बांसवाड़ा में कुशलगढ़ की जागीर दी गयी। बाद में इसे स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया।
किशनगढ़ (राजपूताना) : जोधा की आठवीं पीढ़ी के राजकुमार किशनसिंह, (जो कि मोटा राजा उदयसिंह का पुत्र था) ने 1609 में किशनगढ़ राज्य की स्थापना की।
नागौर (राजपूताना) : राव जोधा के दसवीं पीढ़ी के राजकुमार राव अमरसिंह ने जोधपुर राज्य में से पृथक एवं स्वतंत्र नागौर राज्य की स्थापना की। महाराजा अजीतसिंह के समय में नागौर राज्य पुनः जोधपुर राज्य में सम्मिलित कर लिया गया।
रूपनगढ़ (राजपूताना) : जोधा के वंशज सावंतसिंह के पुत्र राजकुमार सरदारसिंह ने किशनगढ़ राज्य में से अलग रूपनगढ़ राज्य की स्थापना की। बाद में बिड़दसिंह के समय यह राज्य पुनः किशनगढ़ राज्य में सम्मिलित हो गया।
झाबुआ (मालवा) : यह राज परिवार जोधपुर के महान राठौड़ वंश की एक शाखा है। जोधा के पुत्र वरसिंह (जिसे जोधा ने मेड़ता की जागीर पर नियुक्त किया था) के पांचवीं पीढ़ी के वंशज भीमसिंह के पुत्र केशवदास ने 1548 में मालवा क्षेत्र में झाबुआ राज्य की स्थापना की।
अमझेरा (मालवा) : यह राज परिवार जोधपुर के महान राठौड़ वंश की एक शाखा है। जोधा के छठी पीढ़ी के राव राम, (जो कि राव मालदेव का पुत्र था) के पौत्र जसवंतसिंह के पुत्र जगन्नाथ ने मालवा क्षेत्र में अमझेरा का राज्य स्थापित किया। 1857 ई. में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अमझेरा के शासक बख्तावरसिंह ने क्रांतिकारी सैनिकों का साथ दिया। इसलिये अंग्रेजों द्वारा यह राज्य सिंधिया को दे दिया गया।
रतलाम (मालवा) : यह राज परिवार जोधपुर के महान राठौड़ वंश की एक शाखा है। जोधपुर के राजा उदय सिंह के एक परपोते, अर्थात् जालोर के महेश दास के पुत्र राजा रतन सिंहजी ने 1652 में मालवा में रतलाम का राज्य स्थापित किया।
सीतामऊ (मालवा) : यह राज परिवार जोधपुर के महान राठौड़ वंश की एक शाखा है। रतलाम की शाखा के राजा केशोदास के रतलाम में अपने शासनकाल के दौरान, राज्य कर्मचारियों द्वारा रतलाम में एक महत्वपूर्ण मुगल अधिकारी की हत्या कर दी गई थी, परिणामस्वरूप मुगल सम्राट ने रतलाम को जब्त कर लिया। बाद में महाराजा केशव दास को 1701 में सीतामऊ जागीर में दिया गया।
कच्छी-बड़ौदा (मालवा) : यह राज परिवार जोधपुर के महान राठौड़ वंश की एक शाखा है। रतलाम के महाराजा रतनसिंह राठौड़ के दूसरे पुत्र, राजा रायसिंह को उत्तर मालवा में पहले बदनवर परगना का क्षेत्र प्रदान किया गया था। बाद में 1818 में महाराज भगवती सिंह और धार के आनंद राव के बीच एक समझौता किया गया, जहां कच्छी-बड़ौदा अंग्रेजों के अधीन एक रियासत बन गया।
मुलथान (मालवा) : यह राज परिवार जोधपुर के महान राठौड़ वंश की एक शाखा है। रतलाम के महाराजा रतन सिंह राठौड़ ने छोटे पुत्र, राजा सकतसिंह को दिया। मुगल साम्राज्य के पतन के साथ, मुलथान स्वतंत्र हो गया। अंग्रेजों के आगमन के समय मुलथान शासकों को राजा का ख़िताब मिला।
सैलाना (मालवा) : सैलाना का राज परिवार जोधपुर के महान राठौड़ वंश की एक शाखा है। 1716 में रतलाम के राजा रतन सिंह के पड़पोते राजा जयसिंह को सैलाना की जागीर दी गयी। बाद में उन्होंने आसपास के और क्षेत्रों को जीत लिया और 1731 में खुद को एक स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित किया। 1736 में सैलाना राज्य को ब्रिटिश राज के दौरान एक रियासत का दर्जा दिया गया।
अलीराजपुर (मालवा) : अलीराजपुर के शासक भी जोधपुर के राठौड़ वंश के वंशज हैं। राज्य 1818 में ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया। 1947 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद, अलीराजपुर भारत संघ में शामिल हो गया। अलीराजपुर के अंतिम शासक सुरेंद्र सिंह थे, जिन्होंने बाद में 1980 के दशक में स्पेन में भारत के राजदूत के रूप में कार्य किया
जोबट (मालवा) : अली राजपुर के राणा गुगल देव के छोटे भाई राणा केसर देव जोबट के प्रथम राणा थे।
ईडर : ईडर राज्य की स्थापना मूलतः सीहा के पुत्र सोनग ने की थी। जोधपुर नरेश अभयसिंह के समय में मुगल बादशाह ने ईडर का राज्य अभयसिंह को दे दिया। अभयसिंह के भाई आनंदसिंह ने अभयसिंह से असंतुष्ट होकर ईडर राज्य पर अधिकार कर लिया तथा ईडर राज्य की पुनर्स्थापना की।
(नोट- अपने सुझाव व संशोधन नीचे दिए वाट्सएप नम्बर पर भेज सकते हैं)
घनश्यामसिंह राजवी चंगोई
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राठौड़ वंश की बुन्देला शाखा
राठौड़ वंश की बुन्देला शाखा
राजपूत वंश में वीर बुंदेला का भी महत्वपूर्ण स्थान है। काशी के शासक माणिक राय गहड़वाल (राठौड़) के पांचवे पुत्र का नाम पंचम सिंह था। राज्य न मिलने के कारण वह मध्यप्रदेश में विंध्यवासिनी देवी के चरणों में आया। पंचम सिंह विंध्यवासिनी देवी का परम भक्त था, इसलिए विंध्यवासिनी देवी की स्मृति में इसके वंशज विंध्येय, विंध्येला या *बुंदेला* कहलाए।
पंचम सिंह ने मध्य प्रदेश में अपना राज जमाया। इसके पुत्र वीरभद्र ने अफगान सरदार तातार खाँ को पराजित कर महोबा को राजधानी बनाया। वीरभद्र के प्रपौत्र सोहनपाल ने गढ़कुण्डार को राजधानी बनाया। सोहनपाल की 9वी पीढ़ी में राजा रुद्र प्रताप हुए। इन्होंने विक्रम संवत 1587 में ओरछा बसाया व सुदृढ़ किला तथा राजमहल बनवाए। इसका शेरशाह सूरी से युद्ध हुआ। राजा रूद्र प्रताप के 3 पुत्र भारतीचंद मधुकर व उदयजीत थे।रूद्र प्रताप के बाद मधुकर ओरछा का राजा बना। इसके 8 पुत्र थे। पहला पुत्र राम शाह ओरछा का राजा बना दूसरा पुत्र इंद्रजीत संगीत का रसिक था। प्रसिद्ध कवि केशव इसका दरबारी था। तीसरे पुत्र रत्न सेन को अकबर ने गौड़ प्रदेश का राजा बनाया। चौथे पुत्र वीर सिंह देव ने सलीम के कहने पर अबुल फजल को मारा। इस पर सलीम ने बादशाह बनने पर राम शाह को हटाकर वीरसिंह देव को ओरछा का राजा बनाया। राजा वीर सिंह देव धर्म रक्षक पुरुष था इसने मथुरा में केशव मंदिर व ओरछा में चतुर्भुज मंदिर बनवाया।
वीरसिंह देव के चार पुत्र थे। पहला पुत्र जुझार सिंह शाही मनसबदार हुआ किंतु इसने शाहजहां से बगावत कर दी जिस पर गोड़ों ने इसे मार दिया। दूसरा पुत्र पहाड़ सिंह ओरछा का राजा बना। पहाड़ सिंह के बाद सुजान सिंह ओरछा का राजा बना सुजान सिंह की विक्रम संवत 1725 में मृत्यु होने पर उसके छोटे भाई इंद्रमन को ओरछा का राज मिला। इंद्रमन के वंशज पृथ्वी सिंह ने विक्रम संवत 1840 में राजधानी ओरछा की जगह टीकमगढ़ बनाई।।राजा वीर सिंह देव के तीसरे पुत्र भगवान दास के वंशज दतिया के स्वामी बने। राजा वीर सिंह देव के सबसे छोटे पुत्र *हरदोल* को आज भी लोक देवता के रूप में बुंदेलखंड में पूजा जाता है। राजा रूद्र प्रताप के तीसरे पुत्र उदय जीत के प्रपौत्र चंपत राय शाहजहां से गुरिल्ला युद्ध करते रहे। एक बार वह दारा के साथ काबुल युद्ध में भी गए। उन्होंने औरंगजेब से संधि कर ली।
इस्वी सन् 1664 में चंपत राय की मृत्यु होने पर उनका पुत्र इतिहास प्रसिद्ध वीर छत्रसाल बुंदेला उनका उत्तराधिकारी हुआ। छत्रसाल हमेशा मुगलों के विरुद्ध लड़ता रहा। सन् 1659 ईसवी में छत्रपति शिवाजी से छत्रसाल का मिलन हुआ। छत्रसाल ने सन् 1671 में गढ़ाकोटा जीता व औरंगजेब के सेनापति तव्वाहर खाँ को हराया। यमुना व चंबल के बीच के क्षेत्र में छत्रसाल की दुंदुभी बजने लगी।
*इत जमुना उत नर्मदा , इत चंबल उत तोंस।*
*छत्रसाल सो लरन की , रही ना काहू होंस।।*
सन् 1707 में बादशाह ने छत्रसाल को स्वतंत्र शासक मान लिया। छत्रसाल के 52 पुत्र थे चार रानियों से व 48 दासियों से। रानियों से उत्पन्न पुत्र ह्रदय शाह को पन्ना का वह जगत राज को जैतपुर का राज्य मिला। छत्रसाल एक वीर योद्धा के साथ कुशल राजनीतिज्ञ व सच्चे क्षत्रिय थे। बुंदेले अंग्रेजी काल में भी लड़ते रहे। जगत राज के पुत्र परीक्षित देव को अंग्रेजों ने सन् 1842 में फांसी दी। सन् 1857 में भी बुंदेल नरेशों ने डटकर अंग्रेजी सत्ता का मुकाबला किया। इस प्रकार वीर बुंदेले अपने धर्म व मातृभूमि की रक्षार्थ लड़ते रहे। उनका क्षेत्र आज भी मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड कहलाता है।
*बुंदेला की उप शाखाएँ*- जिगनिया, मोहनिया, दतेले, घुंदेल, डोंगरा, नराटा, विजयरात, जेता, जेतवार, सरनिया, कर्मवार आदि।
- बुंदेला शाखा के राज्य- ओरछा, पन्ना, दतिया, चरावरी, अजयगढ !
(संकलन - घनश्यामसिंह चंगोई)
WhatsApp no. 9460000581



